भागलपुर के सुल्तानगंज स्थित प्राचीन अजगैबीनाथ धाम आस्था, इतिहास और रहस्य का अनोखा संगम है। उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर विशाल ग्रेनाइट की चट्टान पर विराजमान बाबा अजगैबीनाथ के दर्शन के लिए सावन के महीने में लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता है कि देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ को जल अर्पित करने से पहले अजगैबीनाथ पर जल चढ़ाने से श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी होती है।
अजगैबीनाथ धाम से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यता यहां के महंतों को लेकर है। कहा जाता है कि अजगैबीनाथ मठ के महंत देवघर नहीं जाते। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो महंत देवघर जाने का प्रयास करता है, उसकी आंखों की रोशनी प्रभावित होने लगती है।
अजगैबीनाथ मठ के महंत प्रेमा नंद गिरि के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास हजारों वर्ष पुराना बताया जाता है और अब तक यहां 18 महंत हो चुके हैं। मान्यता है कि शुरुआती महंतों में सिद्धार्थ नाथ भारती और केदारनाथ प्रतिदिन गंगा से जल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम जाया करते थे। कथा के अनुसार, एक दिन भगवान शिव ब्राह्मण का रूप धारण कर दोनों महंतों के साथ देवघर गए और उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप में दर्शन दिए। दोनों महंतों ने भगवान शिव से उनके चरणों में स्थान मांगा। इसी मान्यता से अजगैबीनाथ शिवलिंग के समीप दो अन्य शिवलिंग स्थापित होने की बात कही जाती है।
धाम की पूजा परंपरा भी अनोखी है। सुबह की पूजा बाबा बैद्यनाथ के नाम से होती है, जबकि सरकारी पूजा के बाद बाबा अजगैबीनाथ की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
महंत प्रेमा नंद गिरि का दावा है कि उन्होंने भी एक बार देवघर जाने की कोशिश की थी, जिसके बाद उनकी आंखों की रोशनी कम हो गई। हालांकि, यह धार्मिक मान्यता है, जिसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं बताया जाता। आस्था और परंपराओं के कारण सावन में यह धाम लाखों कांवड़ियों के लिए विशेष श्रद्धा का केंद्र बना रहता है।





