मुजफ्फरपुर में अंतर्राष्ट्रीय सेक्स वर्कर्स दिवस के अवसर पर शहर के चर्चित चतुर्भुज स्थान की महिलाओं ने अपने संघर्ष, सामाजिक भेदभाव और सम्मानजनक जीवन की चाह को लेकर खुलकर बात की। शुक्ला रोड स्थित यह इलाका लंबे समय से रेड लाइट एरिया के रूप में जाना जाता है, लेकिन यहां रहने वाली महिलाओं का कहना है कि उनकी पहचान केवल इसी दायरे तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, चतुर्भुज स्थान का नाम यहां स्थित चतुर्भुज भगवान मंदिर से पड़ा। कभी यह क्षेत्र मुजरा और नाच-गान की परंपरा के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन समय के साथ इसकी पहचान देह व्यापार से जुड़ गई। महिलाओं का कहना है कि पूरे इलाके को एक ही नजरिए से देखना उचित नहीं है।
रबीना खातून (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि वर्षों तक उन्हें और उनके परिवार को सामाजिक उपेक्षा का सामना करना पड़ा। बच्चों की पढ़ाई, मकान किराये पर लेने और सामान्य सामाजिक संबंधों में भी पहचान छिपानी पड़ती थी। हालांकि पुलिस पाठशाला और सामाजिक संगठनों के प्रयासों से स्थिति में कुछ सुधार आया है।
वहीं कल्पना (बदला हुआ नाम) कहती हैं कि आज भी उनकी सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक स्वीकार्यता है। बेटियों की शादी और बच्चों की नौकरी के दौरान परिवारों को अपनी पहचान छिपानी पड़ती है। उनका मानना है कि भेदभाव का सबसे अधिक असर बच्चों पर पड़ता है।
इसी समुदाय से आने वाली सामाजिक कार्यकर्ता नसीमा खातून कहती हैं कि सेक्स वर्क और मानव तस्करी को एक समान नहीं माना जाना चाहिए। उनका कहना है कि सेक्स वर्कर्स के अधिकार, सम्मान और पुनर्वास पर गंभीर चर्चा की जरूरत है। समाज उनके बीच रहकर भी उन्हें पूरी तरह स्वीकार नहीं करता।
गौरतलब है कि अंतर्राष्ट्रीय सेक्स वर्कर्स दिवस की शुरुआत 2 जून 1975 को फ्रांस के लियोन शहर में हुए एक ऐतिहासिक आंदोलन से हुई थी। आज भी विभिन्न संगठन सेक्स वर्कर्स को सम्मान, सुरक्षा और श्रमिक के रूप में पहचान दिलाने की मांग कर रहे हैं। मुजफ्फरपुर में भी शिक्षा, स्वास्थ्य और वैकल्पिक रोजगार के माध्यम से महिलाओं और उनके बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास जारी हैं।








