बिहार के सहरसा जिले के मत्स्यगंधा क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक एवं प्रसिद्ध श्री रक्त काली चौसठ योगिनी मंदिर नववर्ष के अवसर पर एक बार फिर श्रद्धा, भक्ति और आस्था का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा। नववर्ष के पहले दिन तड़के से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। बड़ी संख्या में भक्तों ने मां रक्त काली एवं चौसठ योगिनियों के दर्शन-पूजन कर नए साल की शुरुआत मां के आशीर्वाद के साथ की।

 

यह मंदिर अपनी अंडाकार संरचना और चौसठ योगिनियों की दुर्लभ व प्राचीन मूर्तियों के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। तंत्र साधना और हिंदू धर्म में इस मंदिर का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। अपनी विशिष्ट तांत्रिक परंपराओं और साधना पद्धतियों के कारण इसे “तांत्रिक विश्वविद्यालय” के नाम से भी पहचाना जाता है। कोशी क्षेत्र ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार और आसपास के राज्यों से भी श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

 

नववर्ष के अवसर पर मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठान किए गए। भक्तों ने मां से सुख, शांति, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की। मंदिर परिसर में घंटियों की ध्वनि, मंत्रोच्चार और जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत नजर आया। श्रद्धालुओं का मानना है कि सच्चे मन से मां के दरबार में आने से सभी कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

 

मंदिर के पुजारी पंडित रविंद्र नाथ झा ने बताया कि मां रक्त काली की महिमा अपरंपार है। जो भी भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ मां के चरणों में अपनी मनोकामना अर्पित करता है, मां उसे अवश्य पूर्ण करती हैं। उन्होंने कहा कि इस वर्ष नववर्ष के मौके पर श्रद्धालुओं की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में कुछ कम रही, लेकिन भक्तों की आस्था और विश्वास में कोई कमी नहीं देखी गई।

 

कुल मिलाकर नववर्ष के अवसर पर श्री रक्त काली चौसठ योगिनी मंदिर भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत केंद्र बनकर नजर आया, जहां मां के दर्शन मात्र से ही भक्तों के चेहरे पर संतोष और शांति झलकती दिखी।

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