बिहार के गया जिले के बाराचट्टी प्रखंड स्थित मनफर गांव आज बदहाली की ऐसी तस्वीर पेश कर रहा है, जहां लोग पेट भरने के लिए मवेशियों के चारे के रूप में इस्तेमाल होने वाला ‘मकई का घट्टा’ खाने को मजबूर हैं। गांव की ग्रामीण पार्वती देवी बताती हैं कि मकई को पानी में फुलाकर, पीसकर और कूटकर चावल जैसा बनाया जाता है, फिर उसी से परिवार का पेट भरता है। उनका कहना है कि राशन कार्ड में पूरे परिवार का नाम नहीं होने से मिलने वाला अनाज पर्याप्त नहीं पड़ता।
ग्रामीण भुवनेश्वर सिंह भोक्ता के मुताबिक, गांव के लोग जंगल से लकड़ी काटकर बेचते हैं और उसी कमाई से किसी तरह जीवन चलाते हैं। कई परिवारों के पास पक्का घर तक नहीं है। गांव में करीब 150 से 200 भोक्ता समुदाय के परिवार रहते हैं, जिनकी आबादी लगभग दो हजार है। खेती और मजदूरी ही आजीविका का मुख्य साधन है, लेकिन रोजगार के स्थायी अवसर नहीं होने से लोग पलायन को मजबूर हैं।
मनफर गांव कभी देशभर में चर्चित रहा था। वर्ष 1962 में लोकनायक Prakash Narayan ने यहां बिहार का पहला ग्रामदान किया था। उन्होंने गांव में सिंचाई, चकबंदी, स्कूल, बांध और कुएं जैसी कई विकास योजनाएं शुरू कराईं। हर खेत तक पानी पहुंचाने और लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की गई थी। ग्रामीण बताते हैं कि जेपी कई महीनों तक गांव में रहे और यहीं ग्राम सभाएं किया करते थे। उनकी पत्थर की कुर्सी और बट वृक्ष आज भी गांव में मौजूद हैं।
हालांकि, जेपी के जाने के बाद गांव विकास की दौड़ में पीछे छूट गया। गांव के पहले छात्र हरेंद्र सिंह भोक्ता कहते हैं कि आजादी के बाद अब तक गांव से केवल दो-तीन लोग ही मैट्रिक पास कर सके हैं। सड़क, रोजगार, शिक्षा और आवास जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव आज भी कायम है।
वहीं, बाराचट्टी के बीडीओ अभिषेक कुमार आशीष ने कहा कि गांव की स्थिति की जांच के लिए विशेष टीम भेजी जाएगी और राशन, आवास व पेंशन जैसी समस्याओं पर कार्रवाई की जाएगी।


