सहरसा जिले के जिला औद्योगिक केंद्र कैंपस में बिजली व्यवस्था की कथित लापरवाही सवालों के घेरे में है। कैंपस परिसर में बिजली की तार की चपेट में आने से एक मवेशी भैंस की मौत हो गई। हालांकि यह खबर सिर्फ एक मवेशी की मौत की नहीं है, बल्कि उस संभावित खतरे की है, जो लंबे समय से लोगों के सिर पर मंडरा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस घटना की जिम्मेदारी किसकी है? क्या बिजली विभाग जर्जर और खतरनाक तारों की स्थिति से अनजान था? या फिर औद्योगिक केंद्र कैंपस के जिम्मेदार लोगों ने खराब बिजली व्यवस्था की जानकारी विभाग तक पहुंचाने में लापरवाही बरती? और यदि विभाग को जानकारी दी गई थी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई, तो मामले को बड़े अधिकारियों के संज्ञान में क्यों नहीं लाया गया?
आज बिजली की तार की चपेट में आने से एक भैंस की जान चली गई, लेकिन अगर यही जर्जर तार किसी राहगीर, कर्मचारी, बच्चे या किसी वाहन पर गिर जाता तो परिणाम कितना भयावह हो सकता था, इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। एक छोटी सी लापरवाही कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है।
सवाल यह भी है कि क्या विभाग और जिम्मेदार संस्थाएं किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रही हैं? क्या बिजली की जर्जर तारों को तभी बदला जाएगा, जब किसी इंसान की जान चली जाएगी? आखिर दुर्घटना होने के बाद जिम्मेदारी तय करने और जांच बैठाने से पहले खतरे को दूर करने की कोशिश क्यों नहीं की जाती?
जिला औद्योगिक केंद्र जैसे महत्वपूर्ण परिसर में प्रतिदिन लोगों और वाहनों की आवाजाही होती है। ऐसे में खुले, जर्जर या नीचे लटकते बिजली के तार किसी भी समय बड़ी दुर्घटना को न्योता दे सकते हैं। जरूरत है कि बिजली विभाग और कैंपस प्रबंधन तत्काल बिजली व्यवस्था की जांच कराएं और खतरनाक तारों को जल्द से जल्द दुरुस्त करें।
यह खबर किसी एक मवेशी की मौत तक सीमित नहीं है। यह खबर एक चेतावनी है—प्रशासन और विभागों के लिए भी और आम लोगों के लिए भी। क्योंकि जब तक हम खतरे को समय रहते पहचानकर उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक किसी न किसी दुर्घटना का इंतजार करते रहेंगे।
अब सवाल यही है—क्या जिम्मेदार लोग इस घटना से सबक लेंगे या फिर किसी बड़े हादसे के बाद ही व्यवस्था की नींद खुलेगी?






