भागलपुर की राजनीति और कांग्रेस परिवार के लिए शुक्रवार, 1 मई 2026 की शाम एक ऐसी खबर लेकर आई जिसने हर किसी को स्तब्ध कर दिया। जिले में पार्टी के नवनियुक्त और बेहद ऊर्जावान जिलाध्यक्ष प्रवीण सिंह कुशवाहा अब हमारे बीच नहीं रहे। दिल्ली से अपने गृह जिला भागलपुर लौटने के दौरान उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले के समीप उनकी कार एक भीषण हादसे का शिकार हो गई। इस हृदयविदारक घटना में प्रवीण सिंह कुशवाहा की जान चली गई, जबकि कार में सवार उनकी साली, उनका भतीजा और चालक गंभीर रूप से घायल हैं। सड़क पर गुजर रहे राहगीरों और स्थानीय पुलिस की मदद से सभी को आनन-फानन में नजदीकी अस्पताल पहुँचाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने काफी मशक्कत की, लेकिन शाम के समय प्रवीण सिंह कुशवाहा को मृत घोषित कर दिया गया। अन्य तीनों घायलों की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है और उनका उपचार जारी है। महज एक महीना पहले ही पार्टी की कमान संभालने वाले एक उभरते हुए नेतृत्व का इस तरह अचानक चले जाना भागलपुर कांग्रेस के लिए एक अपूरणीय क्षति माना जा रहा है।

कन्नौज के पास काल बनी सड़क: कैसे हुआ हादसा?

जानकारी के अनुसार, प्रवीण सिंह कुशवाहा पिछले कुछ दिनों से दिल्ली प्रवास पर थे। वहां से वे अपनी निजी कार द्वारा भागलपुर के लिए रवाना हुए थे। कार में उनके साथ उनकी साली, भतीजा और चालक भी सवार थे। जैसे ही उनकी गाड़ी उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले के मौजपुर के समीप से गुजर रही थी, अचानक कार अनियंत्रित होकर हादसे का शिकार हो गई। टक्कर इतनी भीषण थी कि कार का अगला हिस्सा पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया।

स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि धमाका इतना तेज था कि आसपास के लोग तुरंत मदद के लिए दौड़े। पुलिस को सूचना दी गई और गैस कटर की मदद से कार के दरवाजों को काटकर घायलों को बाहर निकाला गया। प्रवीण सिंह कुशवाहा को गहरी आंतरिक चोटें आई थीं। अस्पताल में भर्ती होने के कुछ घंटों बाद ही उनकी सांसें थम गईं। पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि हादसा किसी तकनीकी खराबी के कारण हुआ, चालक को झपकी आने की वजह से या किसी अन्य वाहन की टक्कर से।

महज एक माह का कार्यकाल: संगठन को दी थी नई दिशा

प्रवीण सिंह कुशवाहा का जिलाध्यक्ष के रूप में कार्यकाल अभी शुरू ही हुआ था। ठीक एक महीने पहले जिला कांग्रेस कमेटी ने उन्हें नया अध्यक्ष मनोनीत किया था। उनके चयन पर जिले के कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह देखा गया था। राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरु ने उन पर जो भरोसा जताया था, उसे प्रवीण कुशवाहा पूरी निष्ठा से निभा रहे थे। कार्यकर्ताओं का मानना था कि एक जमीनी और समर्पित नेता के आने से जिले में पार्टी को वह ऊर्जा मिलेगी जिसकी उसे लंबे समय से तलाश थी।

अपने छोटे से कार्यकाल में उन्होंने गुटबाजी से परे हटकर कार्यकर्ताओं को एकजुट करना शुरू कर दिया था। 20 दिन पहले ही भागलपुर जिला कांग्रेस भवन में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के दौरान उन्होंने भरे गले से कहा था, “मेरे जीवन में संगठन और पार्टी से बढ़कर कुछ भी नहीं है।” उनके इन शब्दों ने वहां मौजूद सैकड़ों कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया था। वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने भी स्वीकार किया था कि कुशवाहा एक संघर्षशील व्यक्तित्व हैं और उनके नेतृत्व में संगठन को नई धार मिलना तय है।

विरासत और व्यक्तित्व: संघर्षों से भरा रहा जीवन

प्रवीण सिंह कुशवाहा का संबंध भागलपुर के एक प्रतिष्ठित और सामाजिक रूप से सक्रिय परिवार से था। उनके पिता स्वर्गीय रामदास सिंह भी सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। प्रवीण कुशवाहा ने खुद को केवल राजनीति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि वे स्थानीय जनसरोकारों, किसानों की समस्याओं, बेरोजगारी और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ हमेशा मुखर रहे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा देवघर से पूरी की थी। साल 2007 में उन्होंने विद्यापीठ, देवघर से स्नातक (बी.ए.) की डिग्री हासिल की थी।

शैक्षणिक योग्यता के साथ-साथ उनके पास संगठन चलाने का एक लंबा अनुभव था। वे लंबे समय से कांग्रेस के विभिन्न पदों पर सक्रिय रहे थे और उनकी पकड़ जिले के हर प्रखंड के कार्यकर्ताओं तक थी। उनकी पत्नी भी सामाजिक कार्यों और व्यवसाय से जुड़ी हैं, जिससे परिवार का एक मजबूत सामाजिक आधार बना हुआ था। उनके पास करीब 5.45 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्ति थी, लेकिन उनके व्यवहार में हमेशा सादगी और आम लोगों के प्रति संवेदनशीलता झलकती थी।

सोशल मीडिया पर आखिरी पोस्ट: पांडव कुमार के लिए मांगी थी न्याय की गुहार

प्रवीण सिंह कुशवाहा की मौत का संयोग और भी मार्मिक है। हादसे से महज छह घंटे पहले उन्होंने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर एक पोस्ट साझा की थी, जो अब उनकी आखिरी पोस्ट बन गई है। इस पोस्ट में उन्होंने दिल्ली में मारे गए बिहार के युवक पांडव कुमार की हत्या को लेकर व्यवस्था पर तीखे सवाल उठाए थे। उन्होंने लिखा था, “दिल्ली की सड़कों पर एक और बिहारी युवा की जान चली गई। पांडव कुमार- एक सपना, एक उम्मीद, जिसे सत्ता की चुप्पी और सिस्टम की गोली ने खत्म कर दिया।”

उन्होंने अपनी पोस्ट में डबल इंजन सरकार पर निशाना साधते हुए पूछा था कि क्या यही ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ का असली चेहरा है? वे बिहार के युवाओं के साथ होने वाले अन्याय को लेकर अंतिम क्षण तक विचलित थे। शायद उन्हें यह अंदाजा भी नहीं था कि जिस दिल्ली की सड़कों पर वे एक बिहारी बेटे के लिए न्याय मांग रहे हैं, उसी दिल्ली से लौटते वक्त उत्तर प्रदेश की सड़कें उनकी अपनी जिंदगी छीन लेंगी।

विधानसभा चुनाव की चुनौती और चुनावी संघर्ष

प्रवीण सिंह कुशवाहा ने चुनावी राजनीति में भी अपनी किस्मत आजमाई थी। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें भागलपुर सदर सीट से उम्मीदवार बनाया था। वह चुनाव उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहा था, क्योंकि उसी सीट पर महागठबंधन के सहयोगी दल राजद ने भी अपना प्रत्याशी उतार दिया था। इस त्रिकोणीय मुकाबले में प्रवीण कुशवाहा को करारी हार का सामना करना पड़ा था।

उस चुनाव में जदयू के प्रत्याशी शुभानंद मुकेश को 1 लाख 30 हजार 767 वोट मिले थे, जबकि दूसरे नंबर पर रहे राजद के रजनीश भारती को 80 हजार 655 वोट प्राप्त हुए थे। प्रवीण सिंह कुशवाहा को 10 हजार से कुछ अधिक मतों से संतोष करना पड़ा था। हालांकि, इस हार ने उनके हौसले को नहीं तोड़ा, बल्कि वे संगठन के कार्यों में और भी अधिक सक्रिय हो गए। उनका मानना था कि चुनाव हारना राजनीति का एक हिस्सा है, लेकिन जनता के बीच बने रहना ही असली सेवा है।

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