बिहार के शिवहर जिले के कुशहर गांव की रहने वाली हसमुन तारा आज हिम्मत, मेहनत और आत्मनिर्भरता की प्रेरणादायक कहानी बन चुकी हैं। कभी आर्थिक तंगी से जूझने वाला उनका परिवार आज पर्स (बटुआ) बनाने के व्यवसाय से हर महीने लाखों की कमाई कर रहा है। उनकी सफलता न सिर्फ उनके परिवार बल्कि आसपास की कई महिलाओं के जीवन में भी बदलाव ला रही है।
एक समय ऐसा था जब हसमुन का आठ सदस्यीय परिवार बेहद कठिन हालात से गुजर रहा था। पति मो. जफिर आलम के साथ तीन बेटों और तीन बेटियों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। परिवार की मासिक आय केवल 3 से 5 हजार रुपये थी, जिससे घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और अन्य जरूरतें पूरी करना बेहद मुश्किल हो जाता था। कई बार उन्हें कर्ज का सहारा भी लेना पड़ता था।
लेकिन हसमुन ने हार नहीं मानी। करीब 10 साल पहले उन्होंने मात्र 8 हजार रुपये से पर्स बनाने का छोटा काम शुरू किया। साल 2019 में वे जीविका समूह से जुड़ीं, जहां से उन्हें बचत और छोटे लोन की सुविधा मिली। इस सहयोग से उन्होंने अपने व्यवसाय को धीरे-धीरे आगे बढ़ाया और आय में बढ़ोतरी होने लगी।
हसमुन बताती हैं कि जीविका से जुड़ने के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। नियमित बचत और लोन के सहारे उन्होंने अपने काम को विस्तार दिया, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई और बच्चों की पढ़ाई भी बेहतर ढंग से होने लगी।
आज उनका व्यवसाय इतना बड़ा हो चुका है कि वे हर महीने करीब 2 लाख रुपये तक की कमाई कर रही हैं। उनके साथ उनके पति भी काम कर रहे हैं, और दरभंगा, दिल्ली व बंगाल से कारीगर आकर उनके साथ जुड़ रहे हैं। साथ ही, आसपास की कई महिलाओं को भी रोजगार मिल रहा है।
हसमुन तारा का संदेश साफ है—अगर महिलाएं ठान लें, तो वे किसी भी परिस्थिति को बदल सकती हैं। उनका सफर संघर्ष से सफलता तक का जीवंत उदाहरण है।
