बेंगलुरु: टैटू बनवाने के शौकीन लोगों के लिए अहम खबर है। कर्नाटक सरकार ने टैटू स्टूडियो और वहां इस्तेमाल होने वाली स्याही को नियंत्रित करने की तैयारी शुरू कर दी है। बाजार से लिए गए टैटू इंक के सैंपल की लैब जांच में 22 तरह की धातुएं, बचे हुए सॉल्वेंट्स और माइक्रोबियल कंटैमिनेशन मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने सख्त नियमों की जरूरत बताई है।
कर्नाटक स्वास्थ्य विभाग ने इस मामले में एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई है। कमेटी ने उपलब्ध अध्ययनों का विश्लेषण कर केंद्र सरकार को विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है। राज्य सरकार टैटू इंक की गुणवत्ता, स्टूडियो की साफ-सफाई, कलाकारों की ट्रेनिंग और सुरक्षित टैटू बनाने के तरीकों को लेकर दिशानिर्देश तैयार कर रही है। साथ ही, कानून बनाने की जरूरत पर भी विचार किया जा रहा है।
कर्नाटक फूड सेफ्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के कमिश्नर श्रीनिवास के. के मुताबिक, टैटू इंक में मौजूद कुछ केमिकल असुरक्षित उत्पाद या गलत तरीके से इस्तेमाल होने पर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा कर सकते हैं।
जांच में अलग-अलग कंपनियों की आठ रंगों वाली इंक के अनौपचारिक सैंपल लिए गए थे। इनमें सेलेनियम, क्रोमियम, प्लेटिनम और आर्सेनिक समेत 22 धातुएं और बचे हुए सॉल्वेंट्स पाए गए। विभाग ने इंक की स्टेरिलिटी को लेकर भी चिंता जताई है। एक ही कंटेनर से कई लोगों के लिए इंक निकालने पर संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।
भारत में फिलहाल टैटू स्टूडियो, कलाकारों और इंक की संरचना के लिए कोई एक समान राष्ट्रीय कानून नहीं है। कर्नाटक ने टैटू इंक को कॉस्मेटिक्स की श्रेणी में लाने और उसके निर्माण, आयात, जांच और लेबलिंग के लिए मानक तय करने का सुझाव दिया है।
प्रस्तावित नियमों में स्टूडियो का रजिस्ट्रेशन, कलाकारों की ट्रेनिंग, नियमित जांच, ग्राहकों की सहमति और बायोमेडिकल कचरे का सुरक्षित निपटान शामिल हो सकता है। स्टरलाइज्ड सिंगल-यूज सुई, डिस्पोजेबल इंक कप, ग्लव्स और सैनिटाइज्ड उपकरणों का इस्तेमाल भी जरूरी किया जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, टैटू से सीधे एचआईवी या हेपेटाइटिस नहीं होता, लेकिन संक्रमित सुई या उपकरण दोबारा इस्तेमाल होने पर संक्रमण फैल सकता है। वहीं दूषित इंक और अस्वच्छ उपकरणों से बैक्टीरियल या फंगल संक्रमण का खतरा रहता है। टैटू के बाद लगातार लालिमा, सूजन, मवाद या बुखार हो तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
हालांकि, उपलब्ध सबूत टैटू और स्किन कैंसर के बीच सीधे संबंध को साबित नहीं करते हैं। इसलिए विशेषज्ञों ने बिना पुख्ता प्रमाण के ऐसे दावों को तथ्य के रूप में पेश करने से बचने की सलाह दी है।






