बिहार के गया जिले की एक छोटी-सी गली आज भी अपनी अनोखी पहचान के लिए जानी जाती है—‘पंखा गली’। नाम से ही साफ है कि यहां कुछ खास है। यह गली सिर्फ एक रास्ता नहीं, बल्कि पीढ़ियों से जीवित एक हस्तशिल्प परंपरा की पहचान है, जहां आज भी हाथ के पंखे बनाकर लोग अपनी आजीविका चलाते हैं।

मानपुर के शिवचरण लेन में स्थित इस गली को साल 2010 में आधिकारिक रूप से ‘पंखा गली’ नाम दिया गया। यहां सैकड़ों सालों से परिवार दर परिवार ताड़ के पत्तों से हाथ के पंखे बनाते आ रहे हैं। एक समय था जब यहां हर साल करीब 15 लाख पंखे बनते थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर लगभग 5 लाख रह गई है। इसकी बड़ी वजह है आधुनिक उपकरणों—एसी, कूलर और इलेक्ट्रिक फैन—का बढ़ता उपयोग।

आज हालात यह हैं कि पंखा बनाना पूरी तरह से सीजनल काम बनकर रह गया है। ज्यादातर कारीगर साल में सिर्फ 2–3 महीने ही यह काम करते हैं, बाकी समय उन्हें मजदूरी या पावरलूम में काम करना पड़ता है। एक पंखा बनाने में करीब 6 रुपये की लागत आती है, जबकि थोक में यह 10–12 रुपये में बिकता है। मेहनत ज्यादा और मुनाफा सीमित है।

फिर भी इस परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं त्योहार और संस्कृति। खासकर के दौरान पंखों की मांग अचानक बढ़ जाती है, जिससे कारीगरों को कुछ राहत मिलती है। यहां बने रंग-बिरंगे पंखे बिहार ही नहीं, बल्कि झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और ओडिशा तक भेजे जाते हैं।

कारीगर बताते हैं कि यह हुनर उन्हें अपने पूर्वजों से मिला है। पूरा परिवार मिलकर ताड़ के पत्तों को काट-छांटकर पंखे तैयार करता है। एक कारीगर सीजन में 20–25 हजार पंखे तक बना लेता है, लेकिन बढ़ती लागत और घटती मांग के कारण कमाई सीमित ही रहती है।

आधुनिकता की दौड़ में भले ही हाथ का पंखा पीछे छूटता दिख रहा हो, लेकिन परंपराएं अभी भी इसे जिंदा रखे हुए हैं। ‘पंखा गली’ आज भी इस बात का प्रतीक है कि विरासत, अगर साथ मिले, तो समय की आंधी में भी टिक सकती है।

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