शिवहर: बिहार के शिवहर जिले के पुरनहिया प्रखंड का कटैया गांव आज भी 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की गवाही देता है। जब महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया, तब गांव के आठ नौजवानों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया और देश की आजादी के लिए शहादत दी।
इन अमर सपूतों में स्वतंत्रता सेनानी सिद्धिनाथ झा का नाम भी शामिल है। वे क्रांतिकारी होने के साथ कुशल वैद्य भी थे। उस दौर में जब गांवों में चिकित्सा सुविधाएं बेहद सीमित थीं, सिद्धिनाथ झा गांव-गांव और घर-घर जाकर लोगों का इलाज करते थे। अंग्रेजों के दमन और अत्याचार के बावजूद उन्होंने समाज सेवा का काम नहीं छोड़ा। आंदोलन के दौरान उन्हें कई यातनाएं भी सहनी पड़ीं। एक बार गोली उनके कान को छूकर निकल गई, लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा।
आज उनके पौत्र मधुकर कुमार दादा की यादों और विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। वे बताते हैं कि दादा अनुशासनप्रिय थे, लेकिन बच्चों के प्रति बेहद स्नेही भी थे। मधुकर ने बिहार बोर्ड से दसवीं में 80 प्रतिशत और बारहवीं में 84 प्रतिशत अंक हासिल किए। इसके बाद अंग्रेजी ऑनर्स से स्नातक किया और अब बीएएमएस की पढ़ाई कर रहे हैं।
सिद्धिनाथ झा की वैद्य परंपरा को परिवार ने सेवा के रूप में जीवित रखा है। उनके नाम से क्षेत्र में चिकित्सा सेवा भी संचालित हो रही है, जो उनके लिए एक जीवंत स्मारक की तरह है।
लेकिन कटैया के ग्रामीणों की एक बड़ी मांग आज भी अधूरी है। गांव के आठ शहीदों की याद में अब तक कोई भव्य स्मारक या शहीद द्वार नहीं बन सका है। शहीद परिवार स्मारक के लिए अपनी जमीन देने को तैयार हैं और सरकार से निर्माण व सौंदर्यीकरण की जिम्मेदारी उठाने की मांग कर रहे हैं।
परिवार की मांग है कि गांव के चौक पर कम से कम एक स्वतंत्रता सेनानी द्वार बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि कटैया की मिट्टी ने आजादी की लड़ाई में कितनी बड़ी कीमत चुकाई थी।
आजादी के उत्सव के बीच कटैया के आठ शहीदों की स्मृति सम्मान की प्रतीक्षा कर रही है। अब जरूरत है कि इन गुमनाम सितारों को इतिहास में वह स्थान मिले, जिसके वे हकदार हैं।






