उत्तर बिहार में मानसून का डर: बाढ़ और कटाव से हर साल उजड़ते हजारों परिवार, स्थायी समाधान की आस


उत्तर बिहार में मानसून जहां किसानों के लिए खुशियां लाता है, वहीं हजारों परिवारों के लिए यह डर और तबाही का मौसम बन जाता है। मुजफ्फरपुर, सुपौल, पूर्वी चंपारण समेत कई जिलों में नेपाल से आने वाली नदियों का जलस्तर बढ़ते ही बाढ़ और कटाव का खतरा मंडराने लगता है। ईटीवी भारत की ग्राउंड रिपोर्ट में लोगों की पीड़ा और सरकारी दावों के बीच की हकीकत सामने आई है।


मुजफ्फरपुर के औराई, कटरा, गायघाट, मीनापुर, मुशहरी और बोचहां प्रखंड हर साल बागमती, बूढ़ी गंडक और अन्य नदियों की बाढ़ से प्रभावित होते हैं। जलस्तर बढ़ते ही सड़कें डूब जाती हैं, गांवों का संपर्क टूट जाता है और लोग नावों या तटबंधों का सहारा लेने को मजबूर हो जाते हैं।

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स्थानीय ग्रामीण रामनरेश सहनी बताते हैं कि बाढ़ आते ही पूरा परिवार 15 से 20 दिनों तक तटबंध पर रहने को मजबूर हो जाता है। पीने का पानी, भोजन, दवा और रोजगार की भारी समस्या खड़ी हो जाती है। उनका कहना है कि “जान बचेगी, तभी वोट देंगे।”

ग्रामीणों का कहना है कि बागमती के तटबंध पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। अगर तटबंध टूटा तो करीब 20 गांव कुछ ही घंटों में जलमग्न हो सकते हैं। लोगों ने समय रहते तटबंध की मरम्मत और स्थायी समाधान की मांग की है।

वीओ:
वहीं सुपौल में खतरा केवल बाढ़ का नहीं, बल्कि कोसी नदी के कटाव का भी है। किशनपुर प्रखंड के बेला गोठ गांव में हर सुबह लोगों को यह डर सताता है कि अगला घर किसका नदी में समा जाएगा। इस साल अब तक करीब 30 परिवार अपना आशियाना खो चुके हैं। कई लोगों को सामान निकालने तक का मौका नहीं मिला।

ग्रामीणों का कहना है कि राहत शिविर और राशन हर साल मिल जाता है, लेकिन बाढ़ और कटाव की स्थायी समस्या का समाधान आज तक नहीं हो सका। हर मानसून के साथ डर, विस्थापन और नुकसान की वही कहानी दोहराई जाती है।
उत्तर बिहार के लाखों लोग आज भी ऐसे स्थायी समाधान का इंतजार कर रहे हैं, जिससे हर साल आने वाली बाढ़ उनकी नियति नहीं, बल्कि बीते समय की कहानी बन सके।

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