मिथिलांचल की अनूठी लोक परंपरा: झिझिया की लौ में आज भी जीवित है सदियों पुरानी आस्था

शिवहर/सीतामढ़ी: आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बीच बिहार के मिथिलांचल में आज भी सदियों पुरानी लोक परंपराएं अपनी पहचान बनाए हुए हैं। इन्हीं में एक है झिझिया लोकनृत्य, जिसकी रोशनी शारदीय नवरात्र के दौरान शिवहर और सीतामढ़ी समेत पूरे मिथिलांचल में आस्था, संस्कृति और परंपरा का संदेश देती है।

झिझिया केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि मिथिलांचल की सांस्कृतिक विरासत और महिलाओं की सामूहिक आस्था का प्रतीक है। इस नृत्य में कुंवारी लड़कियां और महिलाएं मिट्टी के छिद्रदार घड़े में दीप जलाकर उसे अपने सिर पर रखती हैं और पारंपरिक मैथिली लोकगीतों की धुन पर गोल घेरा बनाकर नृत्य करती हैं। घड़े के छोटे-छोटे छिद्रों से निकलती रोशनी रात के अंधेरे में अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती है।

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क्या है झिझिया का महत्व?

लोकमान्यताओं के अनुसार, झिझिया का संबंध मां दुर्गा की आराधना और परिवार की सुख-समृद्धि से जुड़ा है। महिलाएं यह अनुष्ठान अपने बच्चों और परिजनों की सुरक्षा तथा बुरी नजर से बचाव की कामना के साथ करती हैं। हालांकि, इस परंपरा के आरंभ का कोई प्रमाणिक लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है। इसकी मान्यताएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ती रही हैं।

झिझिया से जुड़ी एक प्रचलित मान्यता यह भी है कि यदि कोई डायन घड़े के छिद्रों को गिन ले, तो नर्तकी पर संकट आ सकता है। इसी वजह से घड़े में बड़ी संख्या में छोटे-छोटे छेद किए जाते हैं। यह मान्यता लोकविश्वास का हिस्सा है, जिसका वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

शिवहर में आज भी कायम है परंपरा

शिवहर के गांवों से लेकर देवी मंदिरों और पूजा पंडालों तक नवरात्र के दौरान झिझिया की छटा देखने को मिलती है। पारंपरिक परिधान और आभूषणों से सजी महिलाएं लोकगीत गाते हुए अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखती हैं। बुजुर्ग पूर्व जिला पार्षद अजब लाल चौधरी के अनुसार, पहले बागमती नदी के तट पर भी महिलाएं झिझिया करती थीं, लेकिन समय के साथ वहां यह परंपरा कमजोर पड़ गई।

वहीं, लोककथाओं में राजा चित्रसेन और उनकी रानी की कथा का भी उल्लेख मिलता है, हालांकि इसकी ऐतिहासिक पुष्टि नहीं है।

झिझिया का महत्व धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यह महिलाओं को एकजुट होने, अपनी भावनाएं व्यक्त करने और लोकसंस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर भी देता है। मैथिली गीतों की मिठास और दीपों की जगमगाहट के साथ झिझिया आज भी मिथिलांचल की पहचान और सांस्कृतिक धरोहर बनी हुई है।

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