वॉशिंगटन से एक बड़ी खबर सामने आई है, जहां अमेरिकी राष्ट्रपति ने आयातित पेटेंट दवाओं पर 100 प्रतिशत तक सीमा शुल्क लगाने का ऐतिहासिक और सख्त फैसला लिया है। इस कदम को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए ट्रंप प्रशासन ने साफ कहा है कि दवाओं और उनके कच्चे माल के लिए विदेशी देशों पर अत्यधिक निर्भरता अमेरिका के लिए जोखिम बनती जा रही है।

गुरुवार को जारी आधिकारिक घोषणा में कहा गया कि अमेरिका में बड़ी मात्रा में दवाओं का आयात हो रहा है, खासकर उनके एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API)। अगर किसी युद्ध या वैश्विक संकट की स्थिति बनती है, तो यह निर्भरता अमेरिका की स्वास्थ्य व्यवस्था को कमजोर कर सकती है। यही वजह है कि यह फैसला ‘ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट’ की धारा 232 के तहत लिया गया है, जिसका इस्तेमाल पहले स्टील और एल्युमीनियम पर टैरिफ लगाने के लिए किया जा चुका है।

नई नीति के अनुसार, अधिकांश आयातित पेटेंट दवाओं पर 100% तक का भारी शुल्क लगाया जाएगा। हालांकि, कुछ विशेष श्रेणियों और चुनिंदा देशों को अस्थायी राहत दी गई है। फिलहाल जेनेरिक दवाओं को इस टैरिफ से बाहर रखा गया है, जिससे आम उपभोक्ताओं पर तत्काल असर सीमित रह सकता है।

भारत और चीन जैसे देश, जो API और जेनेरिक दवाओं के बड़े उत्पादक हैं, इस फैसले पर नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भविष्य में इस नीति का दायरा बढ़ता है, तो भारतीय दवा उद्योग पर भी इसका गहरा असर पड़ सकता है।

अमेरिकी प्रशासन ने साफ किया है कि इस नीति का मकसद सिर्फ टैक्स बढ़ाना नहीं, बल्कि ‘मेक इन अमेरिका’ को बढ़ावा देना है। जो कंपनियां अपने मैन्युफैक्चरिंग प्लांट अमेरिका में स्थापित करेंगी, उन्हें शुरुआती चार वर्षों तक 20% का रियायती टैरिफ दिया जाएगा।

यह नई व्यवस्था 31 जुलाई 2026 से चरणबद्ध तरीके से लागू होगी। इस फैसले से वैश्विक फार्मा बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है और आने वाले समय में दवाओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव संभव है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *