विलक्षण जिलों के मोहनपुर निवासी डॉ. संदीप कुमार सागर की कहानी साहस, संघर्ष और समाजसेवा की एक अद्भुत मिसाल है। एक समय ऐसा था जब वे जीने की उम्मीद छोड़ कर चले गए थे, लेकिन आज हजारों लोगों की जिंदगी जीने का माध्यम बन गई है। केमिस्ट्री में एमएस और सीजी की डिग्री हासिल करने वाले संदीप ने यह साबित कर दिया कि मजबूती के सामने कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं होती।

साल 2010 में एक भीषण ट्रेन हादसे ने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी। एक इंटरव्यू के दौरान मिठनपुरा के पास वे ट्रेन से गिर पड़े और इस हादसे में उनके दोनों पैर कट गए। गंभीर स्थिति में अस्पताल पहुंचाए गए संदीप को बचाने के लिए 19 यूनिट खून चढ़ाया गया। परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों के सहयोग से उनकी जान बच गई।

करीब 72 घंटे तक जिंदगी और मौत के बाद जब उन्हें शक हुआ तो सब कुछ बदल गया। दो साल तक घर में रहने के बावजूद उन्हें पैसा नहीं मिला। उन्होंने फिर से कृत्रिम सिद्धांतों और जीवन को नई दिशा दी।

इसी दौरान उनके मन में एक संकल्प पैदा हुआ-जिस खून ने अपनी जान बचाई, अब वही उनका मिशन बनेगा। उन्होंने ‘वैशाली ब्लड लाइन’ संस्था की शुरुआत और वोट को जनआंदोलन बनाया। अब तक उनके नेतृत्व में 298 स्थानों पर आयोजित किए गए अस्पतालों में शिविर लगाए गए हैं, जिनमें सैकड़ों इकाइयां रक्त एकत्रित हुई हैं।

डॉ. संदीप अब तक 4 हजार से ज्यादा लोगों की जान बचाने में मदद कर चुके हैं और 6 हजार से ज्यादा लोगों को प्रेरणा के लिए प्रेरित कर चुके हैं। उनके इस कार्य को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है—उनका नाम और दर्ज है।

आज डॉ. संदीप की कहानी यह सिखाती है कि जिंदगी की किरणें इतनी कठिन क्यों न हो, अगर आजाद मजबूत हो तो इंसान न सिर्फ खुद को संभाल सकता है, बल्कि किताबों के लिए भी उम्मीद की किरण बन सकती है।

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