अररिया से इंसानियत को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहां 12 साल के एक मासूम को काम दिलाने के नाम पर दलालों ने मानव तस्करी के जाल में फंसा दिया। 13 साल तक जबरन मजदूरी, मारपीट और कैद जैसी ज़िंदगी जीने के बाद अब उसकी घर वापसी संभव हो पाई है।
पीड़ित युवक का नाम मुन्ना उर्फ जमशेद है, जो अररिया जिले के बौसी थाना क्षेत्र के करेला गांव का रहने वाला है। मुन्ना ने बताया कि महज 12 साल की उम्र में ब्रोकर जावेद, मुर्शीद और दुक्खन उसे काम दिलाने के बहाने बनारस लेकर गए। वहां कुछ दिन काम कराने के बाद उसे दूसरे लोगों के हवाले कर दिया गया। इसके बाद उसे गुवाहाटी, नागालैंड और फिर म्यांमार भेज दिया गया।
म्यांमार में एक रॉड बनाने वाली फैक्ट्री में उसे बंद कर दिया गया, जहां दिन-रात जबरन काम कराया जाता था। मुन्ना के मुताबिक, उसे 16 लाख रुपये में कंपनी को बेच दिया गया था। जब भी वह भागने की कोशिश करता, उसके साथ बेरहमी से मारपीट की जाती। सिर फोड़ा गया, शरीर पर गंभीर चोटें आईं। कौन-से इंजेक्शन लगाए जाते थे, यह तक उसे नहीं पता। कई बार उसके शरीर से खून भी निकाला गया।
मुन्ना का कहना है कि वह सिर्फ अपनी मां का चेहरा देखने के लिए तड़पता रहा, लेकिन उसे घर आने नहीं दिया गया। कड़ी सुरक्षा के बीच वहां से निकल पाना नामुमकिन था।
इस पूरी लड़ाई में सबसे बड़ा संघर्ष मुन्ना की मां जरीना ने किया। बेटे की तलाश में वह अररिया से पटना और दिल्ली तक भटकती रहीं। साल 2012 में उन्होंने बौसी थाने में दलालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। कोर्ट और प्रशासन के चक्कर लगाती रहीं। आखिरकार न्यायालय की सख्ती और कुर्की के आदेश के बाद दलालों ने दबाव में आकर मुन्ना को भारत लौटाया।
26 दिसंबर को मुन्ना अररिया पहुंचा और 5 जनवरी को बाल कल्याण समिति की मदद से उसे परिवार के हवाले किया गया। बाल कल्याण समिति ने इसे एक मां की जीत बताते हुए मानव तस्करी के बढ़ते मामलों पर गंभीर चिंता जताई है।
यह कहानी न सिर्फ एक पीड़ा है, बल्कि सिस्टम के लिए एक बड़ा सवाल भी है।
