बिहार में जहां एक ओर 40 से 45 डिग्री तक भीषण गर्मी पड़ रही है, वहीं अब एक नई कृषि तकनीक की उम्मीद की नई किरण उभर रही है। दक्षिण बिहार सेंट्रल यूनिवर्सिटी के इलेक्ट्रॉनिक्स द्वारा “शेडनेट इंडिटरमिनेट” तकनीक के माध्यम से बेमौसम टमाटर उत्पादन का सफल परीक्षण शुरू हो गया है। यह तकनीक न केवल सीज़न की मार से बचती है, बल्कि किसानों को कई गुना अधिक लाभ भी दे सकती है।

इस तकनीक की खास बात यह है कि टमाटर के पौधे जमीन पर 12 से 15 फीट की जगह 12 से 15 फीट तक मजबूत हो जाते हैं। प्रोटोटाइप को ऊपर तार से सहारा दिया जाता है, जिससे टमाटर नीचे लटकते हुए विकसित होते हैं। हर नामकरण पर फल आने से उत्पाद में काफी वृद्धि होती है और गुणवत्ता भी बेहतर होती है।

नेट शेड और बेड टेक्नोलॉजी के संयोजन से इंटरमीडिएट को धूपदान, बेहतर जल असबाब और हेल्थकेयर से सुरक्षा मिलती है। यह तकनीक 50% से 90% तक छाया प्रदान करती है, जिससे समरस में भी किसी भी कंपनी का विकास प्रभावित नहीं होता है। साथ ही, नियंत्रण में पत्थरों और पत्थरों का खतरा भी कम हो जाता है।

कीमत की बात करें तो एक पौधे पर सिर्फ 8 से 10 रुपये का खर्च आता है, जबकि एक पौधे पर 25 से 30 किलो टमाटर तक का खर्च आ सकता है। यदि बाजार में कीमत 20 रुपये प्रति किलो भी हो, तो एक उपाय से लगभग 500 रुपये की बिक्री संभव है। पारंपरिक की खेती की तुलना में यह तकनीक दोहरा उत्पादन करती है – जहां पहले एक कट्ठा में 500 किलो टमाटर का उत्पादन होता था, अब 1000 किलो तक उत्पादन संभव है।

सरकार भी इस तकनीक को बढ़ावा दे रही है और शेड नेट या पॉलीहाउस का उपयोग 70 से 80 प्रतिशत तक सीमित कर रही है। नेशनल हॉर्टिकल मिशन के तहत किसानों को आर्थिक सहायता मिल रही है।

यह तकनीक न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मदद करेगी, बल्कि उन्हें मौसम की अनिश्चितताओं से भी बचाएगी। यदि इसे बड़े स्तर पर स्थापित किया जाए, तो यह खेती में एक नई क्रांति साबित हो सकती है।

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