गया जिले के केंदुई बक्सू बिगहा प्राइमरी स्कूल की स्थिति सरकारी शिक्षा व्यवस्था की है जो कि ग्राउंड फ्लोर पर है। यहां न स्कूल भवन है, न शौचालय और न ही पीने के पानी की व्यवस्था। 1997 से यह स्कूल रोड किनारे एक मंदिर में संचालित हो रहा है, जहाँ लगभग 96 छात्र-छात्राएँ रहते हैं, जिनमें अधिकांश लड़कियाँ हैं।
सबसे गंभीर समस्या शौचालय की कमी है, जिसका अर्थ है सीधी असर वाली छात्राएं और महिला शिक्षक। एक शिक्षक के अनुसार, होटलों के लिए उन्हें 10-12 घंटे तक एक ही पैड में देखना पड़ता है, क्योंकि स्कूल में कोई सुविधा नहीं होती है। पानी कम कंपनी अपनी जबरन बन गई, जिससे स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ा। एक बुजुर्ग शिक्षिका को गर्भपात संबंधी समस्या के कारण ऑपरेशन तक करना पड़ा।
लड़की की स्थिति भी बेहद मर्दाना है। कई साक्ष्य बताते हैं कि शौचालय न होने के कारण वे बीच में ही घर जाते हैं और अक्सर वे स्कूल नहीं लौटते हैं। यही वजह है कि नामांकन में लगातार गिरावट आ रही है। पहले जहां करीब 150 छात्र थे, अब यह संख्या 100 से भी कम हो गई है।
स्कूल में न बेंच है, न खेल सामग्री और न ही स्वच्छ पानी। गर्मी, बारिश और ठंड—हर मौसम में बच्चों और शिक्षकों को कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई करने के लिए मजबूर किया जाता है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन इस रास्ते से रोजाना प्रवेश देता है, लेकिन कभी-कभी स्कूल की स्थिति देखने से नहीं रुकती। हालांकि जिला प्रशासन का कहना है कि ऐसे लोगों को जल्द ही सुधार की कोशिश की जा रही है।
मामला सिर्फ एक स्कूल का नहीं है, बल्कि पूरे राज्य और देश में कई स्कूलों की इसी समस्या से जूझ रहे हैं। हाल ही में साम्राज्य में भी शौचालय के लिए शौचालय की कमी का उठाव किया गया था, जिसमें बताया गया था कि इस कारण लाखों छात्रों को पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
राजधानी में स्थिति निश्चित रूप से कुछ बेहतर है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में अब भी सांस्कृतिक विरासत की भारी कमी बनी हुई है, जो शिक्षा के अधिकार पर गंभीर सवाल उठाती है।
