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22 जुलाई 2024 की रात, भागलपुर के मायागंज अस्पताल के पीछे स्थित नर्स क्वार्टर में एक सनसनीखेज चोरी की वारदात सामने आई, जिसने पूरे क्षेत्र को हिलाकर रख दिया। यह चोरी इंटर्न हॉस्टल वार्डन मीनू कुमारी के सरकारी आवास में हुई, जब वह अपने परिवार के साथ बाहर गई हुई थीं। चोरों ने करीब 10 लाख रुपये मूल्य के जेवरात और अन्य कीमती सामान पर हाथ साफ कर दिया।
घटना की जानकारी सबसे पहले ड्राइवर अखिलेश उर्फ मुन्ना पासवान द्वारा 24 जुलाई को दी गई। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह एक पीड़ित परिवार के लिए और भी अधिक तकलीफदेह साबित हुआ।
25 जुलाई को मीनू कुमारी जब अपने परिवार के साथ स्थानीय थाने पहुँचीं, तो उन्हें शाम 7 बजे से लेकर रात 12 बजे तक बैठाकर रखा गया। परिवार ने ड्राइवर अखिलेश पर संदेह जताया, लेकिन जब तक एफआईआर से उसका नाम नहीं हटाया गया, रिपोर्ट दर्ज करने से इनकार कर दिया गया।
26 जुलाई को विधिवत आवेदन दिया गया, लेकिन 29 जुलाई तक किसी तरह की कोई जांच नहीं शुरू की गई, जबकि थाना मात्र 100 मीटर की दूरी पर स्थित है। इस लापरवाही से निराश होकर मीनू कुमारी ने एसएसपी को आवेदन सौंपा। एसएसपी के निर्देश पर पुलिस टीम तो भेजी गई, लेकिन उनकी कार्यशैली ने पीड़ित परिवार की उम्मीदों को और भी चोट पहुँचाई।
घर की दीवारों और फर्श पर खून के धब्बे स्पष्ट रूप से मौजूद थे, लेकिन जांच अधिकारी ने उन्हें “पेंट” बताकर अनदेखा कर दिया और किसी प्रकार का कोई वैज्ञानिक साक्ष्य संकलन नहीं किया गया। एफएसएल टीम को नहीं बुलाया गया, न ही फिंगरप्रिंट लिए गए।
जांच में इस तरह की लापरवाही और संवेदनहीनता से मीनू कुमारी और उनका परिवार पूरी तरह से टूट चुका है। लगातार कई महीनों तक वे अधिकारियों और थाने के चक्कर काटते रहे, लेकिन कार्रवाई के नाम पर उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिलता रहा। लगभग छह महीने बाद एक आरोपी की गिरफ्तारी जरूर हुई, लेकिन चोरी का सामान आज तक बरामद नहीं हो पाया।
और तो और, गिरफ्तार आरोपी अब जमानत पर बाहर है, जिससे पीड़ित परिवार की चिंता और भय और भी बढ़ गया है। मीनू कुमारी का कहना है कि वह और उनका परिवार अब भी रोज रात डर के साये में सोने को मजबूर हैं।
सबसे गंभीर बात यह है कि पूरे मामले में पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। पीड़िता का स्पष्ट आरोप है कि पुलिस और अपराधियों के बीच मिलीभगत की आशंका को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है।
आज 10 महीने बीत चुके हैं, लेकिन न्याय की कोई स्पष्ट राह नजर नहीं आती। यह मामला न सिर्फ चोरी की एक वारदात का है, बल्कि यह उस तंत्र की असफलता को भी उजागर करता है जो आम नागरिकों की सुरक्षा और न्याय की गारंटी देता है।
अब सवाल यह है कि क्या इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद प्रशासन जागेगा? क्या मीनू कुमारी और उनके परिवार को इंसाफ मिलेगा? या फिर यह मामला भी सिस्टम की उदासीनता की बलि चढ़ जाएगा?
मायागंज नर्स क्वार्टर की यह घटना एक चेतावनी है—एक संकेत कि जब पुलिस लापरवाह हो और न्याय व्यवस्था मौन, तो आम आदमी के पास क्या बचता है?
समय आ गया है कि प्रशासन न केवल इस मामले की निष्पक्ष जांच कराए, बल्कि दोषियों को सज़ा दिलाकर यह विश्वास दिलाए कि कानून अब भी जिंदा है। वरना यह घटना एक मिसाल बन जाएगी—एक ऐसी मिसाल, जहाँ अपराधी बेखौफ घूमते हैं और पीड़ित परिवार डर में जीने को मजबूर होता है।
