बिहार के गया जिले से शिक्षा व्यवस्था की गंभीर तस्वीर सामने आई है। डोभी प्रखंड की अंगरा पंचायत में शिक्षा विभाग की लापरवाही के कारण करीब 300 छात्र-छात्राओं का भविष्य अधर में लटक गया है। पंचायत की बैठक में अभिभावकों ने फैसला लिया है कि जब तक गांव में स्कूल भवन का निर्माण नहीं होगा, तब तक वे अपने बच्चों को पढ़ने नहीं भेजेंगे। ये सभी बच्चे कक्षा 1 से 8 तक के हैं।
वर्षों से लंबित है समस्या
अंगरा गांव गया जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित है। पंचायत मुख्यालय होने के बावजूद यहां एक भी क्रियाशील प्राथमिक विद्यालय नहीं है। नौ वर्ष पहले तक यहां एक मध्य विद्यालय का भवन था, लेकिन वह जर्जर हो चुका है। वर्ष 2017 में शिक्षा विभाग ने विद्यालय को अंगरा से करीब 4 किलोमीटर दूर गम्हरिया गांव में स्थानांतरित कर दिया। तब से बच्चे रोजाना 8 किलोमीटर पैदल आना-जाना करने को मजबूर हैं।
गांव के सरपंच दुलारचंद दास बताते हैं कि भवन जर्जर होने के बाद उसकी मरम्मत या पुनर्निर्माण की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। “हम कई वर्षों से अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई,” वे कहते हैं।
500 घर, 3000 मतदाता, फिर भी स्कूल नहीं
उपसरपंच प्रतिनिधि विजय यादव के अनुसार, अंगरा गांव की आबादी 7,000 से अधिक है और मतदाताओं की संख्या लगभग 3,000 है। बावजूद इसके, गांव मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। “गांव में एक प्राथमिक विद्यालय का भी न होना बेहद दुखद है। बरसात और गर्मी में बच्चों को स्कूल भेजना खतरे से खाली नहीं,” उन्होंने कहा।
ग्रामीण महिला सर्जी देवी बताती हैं कि छोटे बच्चे रोज स्कूल नहीं जा पाते। “बरसात में रास्ता कीचड़ से भर जाता है, गर्मी में पानी तक नहीं मिलता। अब तो बच्चे पकड़ने की अफवाह से भी डर लगता है,” वे कहती हैं। उनका दर्द साफ झलकता है—“अगर स्कूल पास में होता तो हम खुद छोड़ आते। अब सोचते हैं कि पोता-पोती को खेत में ही लगा दें।”
बच्चों का दर्द: “मेरा क्या कसूर हजूर?”
कक्षा 8 की छात्रा स्नेहा कुमारी भावुक होकर कहती हैं, “मेरा क्या कसूर है हजूर? हम गरीबी से निकलने के लिए पढ़ना चाहते हैं, लेकिन सरकार ही हमें पढ़ाना नहीं चाहती।”
कक्षा 6 की प्रियंका कुमारी, जो आईपीएस बनने का सपना देखती हैं, कहती हैं, “मैं रोज 8 किलोमीटर पैदल चल सकती हूं, लेकिन मेरे छोटे भाई की उम्र 5 साल है। वह कैसे जाएगा?”
छात्र आयुष कुमार बताते हैं कि लंबी दूरी तय करना सुरक्षित भी नहीं है। वहीं प्रिंस कुमार कहते हैं, “बरसात में गिरते-पड़ते स्कूल पहुंचते हैं। कई बार गर्मी में छात्र बेहोश हो जाते हैं और अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है।”
शिक्षक भी परेशान
विद्यालय के प्रधानाध्यापक केदार चौधरी बताते हैं कि 2017 में विद्यालय का स्थानांतरण हुआ था। “स्कूल में 288 छात्रों का नामांकन है, लेकिन रोज औसतन 196 ही पहुंच पाते हैं। सात शिक्षक हैं, पर दूरी के कारण उपस्थिति प्रभावित होती है,” उन्होंने कहा।
शिलान्यास हुआ, निर्माण नहीं
भवन निर्माण को लेकर 2015 में तत्कालीन एमएलसी मनोरमा देवी ने शिलान्यास किया था, लेकिन निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका। बताया जाता है कि भूमि विवाद के कारण राशि वापस हो गई। हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि विवाद सुलझ चुका था और इसकी सूचना अधिकारियों को दे दी गई थी।
उपमुखिया वीरेंद्र कुमार यादव कहते हैं, “अगर समय रहते भवन की मरम्मत कर दी जाती तो आज यह स्थिति नहीं होती। अधिकारी और नेता सबके पास गए, लेकिन समाधान नहीं हुआ।”
वोट बहिष्कार तक पहुंची बात
विद्यालय की मांग को लेकर गांव के लोगों ने विधानसभा चुनाव 2025 में वोट बहिष्कार भी किया था। बाद में प्रशासनिक अधिकारियों ने पहुंचकर समझा-बुझाकर मामला शांत कराया था। ग्रामीणों का आरोप है कि चुनाव के समय नेता सक्रिय हो जाते हैं, लेकिन बाद में कोई ध्यान नहीं देता।
विभाग की सफाई
जिला शिक्षा विभाग के कार्यपालक अभियंता सतीश प्रसाद ने बताया कि चार कमरों के भवन के निर्माण के लिए 2025 में ही एस्टीमेट पटना मुख्यालय भेजा जा चुका है। “निर्णय लंबित है, हम उच्च अधिकारियों से आग्रह करेंगे कि जल्द स्वीकृति मिले,” उन्होंने कहा।
हालांकि जिला शिक्षा पदाधिकारी कृष्ण मुरारी गुप्ता से संपर्क नहीं हो सका। फोन कॉल का भी जवाब नहीं मिला। वहीं डीपीओ गौरव राज ने कहा कि जिले में कितने विद्यालय भवनहीन हैं, इसकी सटीक संख्या फिलहाल बताना संभव नहीं है।
शिक्षा से वंचित 300 बच्चे
ग्रामीणों के अनुसार, 5 से 7 वर्ष आयु वर्ग के 300 से अधिक बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। अधिकांश परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं और निजी विद्यालय में पढ़ाने में सक्षम नहीं। पंचायत ने चेतावनी दी है कि यदि होली के बाद तक निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ, तो बच्चे स्कूल नहीं जाएंगे।
अंगरा गांव की यह तस्वीर न सिर्फ शिक्षा विभाग की लापरवाही उजागर करती है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या गांव के बच्चों को बुनियादी शिक्षा का अधिकार मिल पाएगा या उनके सपने यूं ही अधूरे रह जाएंगे।
