पटना: चुनावी सालों में बांटी जा रही ‘फ्री रेवड़ियों’ का असर अब बिहार समेत कई राज्यों की वित्तीय सेहत पर साफ दिखने लगा है। बिहार सरकार पर मुफ्त योजनाओं और कैश ट्रांसफर का करीब 40 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ चुका है, जिससे बजट संतुलन बिगड़ने की आशंका बढ़ गई है।
वित्तीय वर्ष 2026-27 में राज्य का कुल बजट लगभग 3.47 लाख करोड़ रुपये का है। इसमें ‘नॉन प्लान’ मद के तहत वेतन, पेंशन और ब्याज जैसे अनिवार्य खर्च पहले से ही बड़े हिस्से पर कब्जा किए हुए हैं। ऐसे में मुफ्त योजनाओं के कारण ‘प्लान’ यानी विकास कार्यों के लिए उपलब्ध राशि पर सीधा असर पड़ना तय माना जा रहा है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि बिहार ही नहीं, देश के कई राज्यों में चुनावी घोषणाओं का वित्तीय दबाव बढ़ रहा है। कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, पंजाब और महाराष्ट्र जैसे राज्यों पर भी 25 हजार करोड़ से लेकर 95 हजार करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त बोझ पड़ा है।
राजस्व संग्रह की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है। 2025-26 में बिहार ने जीएसटी और गैर-जीएसटी से 46,500 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा था, लेकिन वसूली करीब 43,324 करोड़ रुपये ही हो सकी। पेट्रोलियम से होने वाली आय भी घटी है, वहीं मुफ्त बिजली योजना के कारण बिजली खपत बढ़ी, लेकिन सरकार को अपेक्षित ड्यूटी नहीं मिल पाई।
इसके अलावा बालू घाटों के 78 लाइसेंस सरेंडर होने से करीब 600 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। अन्य स्रोतों से भी राजस्व में खास बढ़ोतरी नहीं दिख रही है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि राजस्व में सुधार नहीं हुआ और केंद्र से पर्याप्त अनुदान नहीं मिला, तो राज्य को ज्यादा कर्ज लेना पड़ेगा। फिलहाल बिहार पर जीडीपी के मुकाबले कर्ज का बोझ 36-37% तक पहुंच चुका है।
ऐसे में साफ है कि मुफ्त योजनाओं का बढ़ता खर्च सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है, जिसका असर आने वाले समय में विकास योजनाओं पर भी पड़ सकता है।
