बिहार के भोजपुर में सोन नदी पर बना 163 साल पुराना नोएल्वर पुल, जिसे अब अब्दुलबारी पुल के नाम से भी जाना जाता है, आज गंभीर खतरे के दौर से गुजर रहा है। कभी-कभी बांग्लादेश के इंजीनियरिंग इंजीनियरिंग का नमूना माना जाने वाला यह ऐतिहासिक पुल अब अपनी बर्बादी के कारण चिंता का विषय बन गया है।
दानापुर रेलमंडल के अंतर्गत आने वाले इस पुल की मूलभूत संरचना जा रही है। खंभों के नीचे की जमीन खिसक रही है और उन्हें सहारा देने वाले चबूतरे एक-एक कर तोड़ते जा रहे हैं। यह स्थिति किसी बड़े हादसे का संकेत दे रही है। प्रतिदिन इस पुल से राजधानी, वंदे भारत जैसी तेज़ नज़र वाली ट्रेनें और मालगा ग्राइक्स दिखते हैं, वहीं नीचे सड़क मार्ग से वाहन वाहन चलाए जाते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पुल पर भारी दबाव है और इसके नीचे अवैध खनन क्षमता लगातार गिर रही है। सोन नदी में खनन के कारण खंभों के आसपास की सुरक्षा घेरा खत्म हो गया है, जिससे खतरा और बढ़ गया है।
आरोप है कि बिहटा क्षेत्र के बालू घाटों से बिना वैधानिक समर्थकों के बैसाखी की आड़ ली जा रही है, जो इस पुल से जुड़े हुए हैं। इन मछुआरों से दीवाली वाली सड़क पर बाढ़ आती है, जिससे फुलान बहुसंख्यक हैं और दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं। हाल ही में एक बाइक सवार की भी इसी वजह से मौत हो गई।
1862 में तैयार हुआ यह पुल पटना और आरा को जोड़ने के साथ-साथ दिल्ली-हावड़ा रेल मार्ग का अहम हिस्सा है। ऐतिहासिक महत्व रखता है यह पुल अब अपनी सोलोमन द्वीप पर बह रहा है।
रिवोल्यूशन ने प्रशासन से मांग की है कि पुल की जल्द वसूली की जाए, अवैध खनन और रेत के गोदामों पर रोक लगाई जाए, ताकि इस खदान को खोला जा सके। उनका कहना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाया जा सका, तो यह पुल किसी भी समय बड़ी दुर्घटना का कारण बन जाता है।
