पटना: बिहार कांग्रेस के तीन विधायकों पर कार्रवाई की तलवारें लटक रही हैं और आने वाले 2-3 दिनों में दिल्ली में होने वाली अहम बैठक में उनके राजनीतिक भविष्य पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। जिन पर निर्देशित और नाटकीय कार्रवाई के खतरे हैं, उनमें वाल्मिकी नगर से सुंदर कुमार, फारबिसगंज से मनोज मनिहारी से मनोहर विश्वास प्रसाद सिंह शामिल हैं।

इन विश्लेषकों का आरोप है कि जेडीयू ने साझीदारी चुनाव के दौरान बुनियादी ढांचे के उम्मीदवारों का समर्थन नहीं किया। इसके प्रमुख कलाकारों के दावेदारों को हार का सामना करना पड़ रहा है।

इस पूरे मामले में मनोज विश्वास ने अपनी सफाई देते हुए कहा कि अभ्यर्थी चयन की प्रक्रिया जारी नहीं थी। उनका आरोप है कि राजद ने बिना कंसल्टेंसी के उम्मीदवार घोषित कर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने सबसे पहले अपनी पार्टी के नेतृत्व को लेकर अपनी स्थिति का आकलन किया था। विश्वास के अनुसार, यदि अब्दुल बारी बरी या किसी अन्य विचारधारा के नेता को दावेदार बनाया जाए, तो वे समर्थन अवश्य करें।

कांग्रेस की अनुशासित समिति ने त्रिकोणमिति से उत्तर तलब किया था, जो अब प्राप्त हो चुका है। समिति की अपनी रिपोर्ट अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआईसीसी) की नई इकाई है और अब केंद्रीय नेतृत्व के निर्देशों के बाद आगे की कार्रवाई तय होगी।

हालाँकि राजनीतिक सिद्धांतों का मानना ​​है कि कांग्रेस कड़ी कार्रवाई से बच सकती है। बिहार विधानसभा में कांग्रेस के पास सीमित संख्या में विधायक हैं, जिससे पार्टी के पास विकल्प कम हैं।

तकनीकी रूप से देखें तो इन बेंचमार्क के प्रस्तावों पर खतरनाक कम नजर आती है, क्योंकि राज्य अमेरिका चुनाव में व्हिप जारी नहीं होती है। ऐसे में सूचीबद्ध चार्ट (एंटी-डिफेक्शन कानून) लागू होना मुश्किल है। विशेषज्ञ के अनुसार मुख्य कार्रवाई के रूप में रिश्वत को निलंबित किया जा सकता है या बर्खास्तगी की चेतावनी दी जा सकती है।

मित्रता है कि इस मामले में बैल ने क्रॉस वोट की नहीं, बल्कि वोटिंग के दौरान वोटिंग की। अब इब्राहिम की नजरें दिल्ली में होने वाली बैठक पर टिकी हैं, जहां इन रिश्तों के भविष्य पर अंतिम मुहर लगी है।

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