बिहार की पांच राज्यसभा सीटों पर हुए चुनाव में एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर देखने को मिला, जहां पर्याप्त संख्या बल होने के बावजूद महागठबंधन के उम्मीदवार अमरेंद्र धारी सिंह को हार का सामना करना पड़ा। इस हार ने न सिर्फ आरजेडी बल्कि पूरे विपक्षी गठबंधन की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह रही कि कांग्रेस और आरजेडी के कुछ विधायकों के मतदान से दूरी बनाने के कारण यह परिणाम सामने आया।

राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन के पास जीत के लिए जरूरी आंकड़े मौजूद थे। आरजेडी, कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों के समर्थन से यह सीट आसानी से जीती जा सकती थी। लेकिन मतदान के दौरान कांग्रेस के तीन विधायक और आरजेडी के एक विधायक अनुपस्थित रहे, जिससे समीकरण बिगड़ गया और अमरेंद्र धारी सिंह को हार का सामना करना पड़ा।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद कांग्रेस के भीतर ही बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस विधायक मनोज विश्वास ने सीधे तौर पर प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी नेतृत्व की ओर से यह स्पष्ट निर्देश नहीं दिया गया था कि मतदान करना अनिवार्य है। बल्कि उन्हें यह कहा गया था कि वे अपनी इच्छा के अनुसार मतदान करें या न करें।

मनोज विश्वास के मुताबिक, आरजेडी उम्मीदवार के चयन में कांग्रेस से कोई राय नहीं ली गई थी। उन्होंने कहा कि पहले दलित उम्मीदवार उतारने की बात हो रही थी, लेकिन अचानक एक ऐसे व्यक्ति को उम्मीदवार बना दिया गया, जिसका कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जब पार्टी से ही तालमेल नहीं किया गया, तो ऐसे उम्मीदवार का समर्थन करने का कोई औचित्य नहीं था।

कटिहार के मनिहारी से कांग्रेस विधायक मनोहर प्रसाद सिंह ने भी इशारों-इशारों में प्रदेश नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि उन्हें भी यही बताया गया था कि वे अपने विवेक से निर्णय लें। उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर उनसे फोन पर कोई स्पष्ट बातचीत नहीं हुई थी। हालांकि उन्होंने यह साफ किया कि वे कांग्रेस के साथ हैं और पार्टी के फैसलों का सम्मान करते हैं।

वहीं वाल्मीकि नगर से कांग्रेस विधायक सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने खुलकर आरजेडी के उम्मीदवार पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीदवार पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने मतदान से दूरी बनाना बेहतर समझा। उन्होंने सोशल मीडिया पर भी अपनी नाराज़गी जाहिर करते हुए कहा कि महागठबंधन के पास एक बेहतर मौका था, जिसे गलत उम्मीदवार के चयन के कारण गंवा दिया गया।

कुशवाहा ने कहा कि अगर दीपक यादव या मुकेश सहनी जैसे नेताओं को मौका दिया जाता, तो स्थिति अलग हो सकती थी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी भी सूरत में एनडीए का समर्थन नहीं कर सकते, लेकिन गलत उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करना भी उन्हें उचित नहीं लगा।

इस पूरे विवाद के बीच कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने अपनी सफाई दी है। उन्होंने कहा कि पार्टी का स्पष्ट निर्देश था कि महागठबंधन के उम्मीदवार का समर्थन किया जाए। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने 14 तारीख की रात से ही संबंधित विधायकों से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई।

राजेश राम ने कहा कि विधायक खुद वोटर होते हैं और उन्हें पार्टी की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अगर विधायकों को कोई आपत्ति थी, तो उन्हें पहले ही पार्टी नेतृत्व को अवगत कराना चाहिए था।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह हार महागठबंधन के भीतर समन्वय की कमी को उजागर करती है। खासकर कांग्रेस और आरजेडी के बीच तालमेल की कमी इस परिणाम की बड़ी वजह बनी। उम्मीदवार चयन में सहयोगी दलों को विश्वास में नहीं लेना और स्पष्ट निर्देशों का अभाव, इस हार के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।

अमरेंद्र धारी सिंह को कुल 37 वोट मिले, जबकि जीत के लिए 41 वोटों की आवश्यकता थी। यदि कांग्रेस के तीन और आरजेडी के एक विधायक मतदान में शामिल होते, तो परिणाम पूरी तरह से अलग हो सकता था।

यह घटना बिहार की राजनीति में एक बड़ा संदेश देती है कि गठबंधन की राजनीति में आपसी तालमेल और संवाद कितना महत्वपूर्ण होता है। अगर सहयोगी दलों के बीच विश्वास की कमी हो, तो मजबूत संख्या बल भी बेअसर साबित हो सकता है।

फिलहाल, इस हार के बाद महागठबंधन के भीतर आत्ममंथन की जरूरत महसूस की जा रही है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस और आरजेडी इस विवाद को कैसे सुलझाते हैं और क्या भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए कोई ठोस रणनीति बनाते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि केवल आंकड़ों का खेल ही राजनीति में जीत की गारंटी नहीं देता, बल्कि आपसी समझ, विश्वास और स्पष्ट नेतृत्व भी उतना ही जरूरी है।

 

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