पटना: बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों के चुनाव में महागठबंधन को बड़ा झटका लगा, जब उसके चार विधायक मतदान में शामिल नहीं हुए। इनमें आरजेडी के एक और कांग्रेस के तीन विधायक शामिल हैं। इनकी गैरमौजूदगी के कारण महागठबंधन के उम्मीदवार अमरेंद्र धारी सिंह जीत के करीब पहुंचकर भी हार गए और एनडीए ने सभी पांचों सीटों पर कब्जा कर लिया।

गैरहाजिर रहने वाले विधायकों में ढाका से आरजेडी विधायक फैसल रहमान, कांग्रेस के सुरेंद्र कुशवाहा, मनोज विश्वास और मनिहारी के मनोहर प्रसाद शामिल हैं। सभी ने पार्टी लाइन से हटकर फैसला लिया। हालांकि, इन विधायकों ने अपनी-अपनी सफाई दी है। फैसल रहमान ने मां की तबीयत खराब होने का हवाला दिया, जबकि कांग्रेस विधायकों ने कहा कि उन्हें स्वतंत्र निर्णय लेने की छूट दी गई थी।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन ‘बागी’ विधायकों पर कार्रवाई होगी? संवैधानिक जानकारों के मुताबिक, यह आसान नहीं है। कांग्रेस के मामले में स्थिति और कमजोर है क्योंकि पार्टी ने न तो विधानसभा में अपना नेता चुना है और न ही कोई व्हिप जारी किया गया था। ऐसे में अनुशासनात्मक कार्रवाई का आधार कमजोर पड़ जाता है।

वहीं, आरजेडी चाहकर भी अपने विधायक पर सख्त कदम नहीं उठा सकती। अगर वह ऐसा करती है तो उसकी विधानसभा में संख्या घट सकती है, जिससे नेता प्रतिपक्ष का पद भी खतरे में पड़ सकता है। यही कारण है कि कार्रवाई की संभावना कम मानी जा रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि व्हिप उल्लंघन पर कार्रवाई तभी संभव होती है जब विधायकों के खिलाफ विधानसभा अध्यक्ष को औपचारिक शिकायत दी जाए। राज्यसभा चुनाव में व्हिप का प्रभाव भी सीमित माना जाता है, क्योंकि यह चुनाव सदन के सामान्य मतदान से अलग होता है।

पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी के अनुसार, बिना लिखित शिकायत के कोई कार्रवाई संभव नहीं है। पिछले मामलों में भी बागी विधायकों पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई थी। ऐसे में इस बार भी सख्त कदम उठने की संभावना बेहद कम है।

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