सहरसा का सदर अस्पताल एक बार फिर जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलते हुए सामने आया है। 4 फरवरी 2026 को अस्पताल में अचानक बिजली चली गई, और यही वह समय था जब अस्पताल की वास्तविक तैयारियों की कहानी सामने आई। अस्पताल में मौजूद जनरेटर और इनवर्टर की बैटरियां पहले से ही खराब थीं, जिससे करीब डेढ़ घंटे तक पूरे अस्पताल में अंधेरा रहा।
इस दौरान डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ केवल मोबाइल फोन और टॉर्च की रोशनी पर निर्भर होकर मरीजों का इलाज करने को मजबूर हुए। आपातकालीन वार्ड, इमरजेंसी और प्रसूति कक्ष में डॉक्टरों को मोबाइल फ्लैश की रोशनी में काम करना पड़ा। कई मरीजों और उनके परिजनों ने बताया कि बिना बिजली के इलाज होना उनके जीवन का सबसे डरावना अनुभव था। इस दौरान मरीज और परिजन दोनों ही दहशत और चिंता में रहे।
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सहरसा में 100 बेड का नया मातृ एवं शिशु अस्पताल तैयार है, लेकिन उसे अब तक स्थायी बिजली कनेक्शन नहीं मिला है। कनेक्शन के अभाव में अत्याधुनिक अस्पताल चालू नहीं हो पाया, जबकि जिले की गर्भवती महिलाओं और नवजातों को इसकी बेहद जरूरत है।
स्वास्थ्य विभाग की इस लापरवाही ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या बिना स्थायी बिजली के अस्पताल सुरक्षित रूप से काम कर पाएगा? क्या जनरेटर और इनवर्टर की समय पर मरम्मत नहीं की जा सकती थी? क्या नए मातृ एवं शिशु अस्पताल में बिजली कनेक्शन सुनिश्चित नहीं किया जा सकता था?
सवाल तब और गंभीर हो जाते हैं जब देखा जाए कि डेढ़ घंटे तक लाइट कटने के बावजूद कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई। मरीजों की जान पर सीधा खतरा मंडराया और अस्पताल प्रशासन के गंभीर प्रयासों की कमी उजागर हो गई।
अब मरीज, परिजन और सामाजिक संगठन मांग कर रहे हैं कि अस्पताल में स्थायी बिजली व्यवस्था, खराब जनरेटर की मरम्मत और नए मातृ एवं शिशु अस्पताल के कनेक्शन को तुरंत सुनिश्चित किया जाए। ताकि भविष्य में किसी की जान जोखिम में न पड़े और स्वास्थ्य सेवाओं में किसी प्रकार की बाधा न आए।
सहरसा के स्वास्थ्य तंत्र की यह घटना एक चेतावनी है कि आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर होने के बावजूद, अगर आधारभूत तैयारियां नहीं हैं तो मरीजों की जान पर जोखिम हमेशा मंडराता रहेगा।
