बिहार के भोजपुर जिले में आलू किसानों की परेशानी लगातार बढ़ रही है। सोन नदी के तटवर्ती इलाके, जिसे ‘आलू का कटोरा’ कहा जाता है, वहां इस साल अच्छा उत्पादन हुआ, फिर भी किसानों को उनकी फसल का मूल्य नहीं मिल रहा है। बड़हरा, कोईलवर, संदेश और सहारा के बलुआही मिट्टी वाले क्षेत्र में आलू की खेती बड़े पैमाने पर होती है, लेकिन किसानों के चेहरे पर खुशी के बजाय मोही साफ दिख रही है।
किसानों का कहना है कि दूसरे राज्यों से आने वाला आलू ज्यादा साफ-सुथरा और सस्ता होता है, जिससे बाजार में उसकी मांग ज्यादा होती है। इसके चलते स्थानीय आलू की बिक्री प्रभावित हो रही है और आभूषण नहीं मिल रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन इलाक़ों में कोई ठोस थोक मंडी व्यवस्था नहीं है, जहाँ किसान अपनी उपज की कीमत पर बेचें।
किसान विष्णुकांत के बयान हैं कि हालात इतने खराब हो गए हैं कि किसान मानसिक रूप से टूटते जा रहे हैं और कोई भी गलत कदम उठाने की नौबत आ सकती है। वहीं किसान बिरजू, हरिशंकर पंडित, पंडित और मनोज सिंह जैसे कई किसानों ने कहा कि तीन महीने की कड़ी मेहनत के बाद भी उन्हें लागत से कम दाम मिल रहा है।
एक दिलचस्प बात यह है कि आलू की खेती करने में लगभग 30 हजार रुपये तक का खर्च आता है, जिसमें खेती का हिस्सा सबसे ज्यादा होता है। खेत से आलू के पौधे के लिए ‘ढाई पसेरी’ आलू तैयार किया जाता है। इसके बावजूद किसान अपनी फसल के लिए 500 रुपये प्रति व्यक्ति के खाते से वसूलने को मजबूर हैं।
किसानों के अनुसार, बढ़े हुए परिवहन खर्च के कारण वे अपनी उपज को दूर की मंडियों तक नहीं ले जा पा रहे हैं। ऐसे में स्थानीय व्यापारी खेत तक ग्यान औने-समुद्री दाम में आलू खरीद लेते हैं और बाद में बाजार में मसाला बांध पर बेचने लगते हैं।
वहीं, ऑलवेज गार्डन में एलागोनिथ कुमार का कहना है कि इस साल करीब 3 हजार एकड़ में आलू की अच्छी पैदावार हुई है और प्रशासन की ओर से किसानों को बेहतर कीमत दिलाने की कोशिश की जा रही है।
