बिहार की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल यही है कि नीतीश कुमार बाद में सत्ता की कमान संभालेंगे। सर्जना की ओर बढ़ते कदमों के बीच वे फ्रैंक को आगे बढ़ाते हैं, लेकिन इतिहास इस संकेत को लेकर सवाल उठाता है।

पिछले दो दशकों में नीतीश कुमार सहित कई ऐसे नेताओं ने अपने उत्तराधिकार के बारे में बताया, मगर उनका राजनीतिक भविष्य चमक नहीं पाया। कभी उनके सबसे करीबी सहयोगी थे और सत्ता में नंबर दो माने जाते थे। लेकिन 2015 के चुनाव के बाद उनका प्रभाव लगातार घटता गया।

इसी तरह की रणनीति रणनीतिकारों के नेता बनने को भी नीती का दर्जा दिया गया था, लेकिन समानता के बाद वे अलग हो गए और उनकी पार्टी को अब तक कोई खास सफलता नहीं मिली। एक समय पार्टी के शीर्ष नेता भी थे, पर संबंध के आधार पर उनके राजनीतिक रिश्ते लगभग ख़त्म हो गए।

सबसे ज्यादा चर्चा रही की, जिसमें दो बार डिप्टी सीएम बने और उनका उत्तराधिकारी भी देखा गया। इसके बावजूद, उन्हें अब तक मुख्यमंत्री नहीं बने और सिद्धांतों में भी सफलता नहीं मिली।

अब बारी सम्राट चौधरी हैं। उन्हें सार्वजनिक मंचों पर आगे बढ़ाया जा रहा है, लेकिन सवाल उठ रहा है-क्या यह उनके लिए अवसर या जोखिम का समर्थन करता है?

राजनीतिक सिद्धांतों का मानना ​​है कि अंतिम निर्णय केवल नीतीश नहीं, बल्कि विशेष रूप से भाजपा की रणनीति तय करेंगे। सामाजिक पहलू, विशेष रूप से कुर्मी-कुशवाहा और अति दलित वोट बैंक, भी अहम भूमिका निभाएंगे।

इसी बीच, नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री का विवरण और विवरण दिया गया है। अगर उन्हें आगे बढ़ाया गया, तो सम्राट की राह और मुश्किल हो सकती है।

कुल मिलाकर, बिहार की नवागत में उत्तराधिकार का प्रश्न अब भी खुला है—और इतिहास गवाह है कि नतीज़ा के संस्थापक हमेशा अंतिम सत्य नहीं होते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *