कैमूर: साफ और स्वच्छ पानी जीवन का आधार है। यही कारण है कि किसिलीट प्रिंस को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मूल अधिकार माना गया है। बिहार में घर-घर नल का जल योजना के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षी ‘नल-जल योजना’ शुरू हो रही है। केंद्र सरकार भी हर घर तक साफ पानी की सलाह देती है। लेकिन कैमूर जिले का एक गांव ऐसा भी है, जहां आज भी लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं।
भभुआ के रतवार पंचायत भारीगांव गांव में नल-जल योजना के तहत पाइपलाइन बिछाई गई है और पानी की योजना भी बनाई गई है। फिर भी आज तक नल से पानी नहीं मिला। गांव के लोग आज भी अपने तीर्थस्थलों के लिए तालाबों और तालाबों के पानी पर प्रतिबंध लगाते हैं।
रिवायत के अनुसार गाँव में सरकारी दुकान भी नहीं है। कुछ निजी किसी भी दस्तावेज़ हैं, लेकिन वहाँ से हर को पानी की मंजूरी की प्रविष्टियाँ नहीं हैं। ऐसे में लोग इधर-उधर से पानी मांगकर या फिर तालाब और तालाब का सहारा लेकर अपनी जरूरतें पूरी कर रहे हैं।
भारीगांव गांव के वार्ड नंबर 14 और 15 में करीब 700 से 800 घर हैं। यहां के लोग आज भी समुच्चय का पानी पीने को मजबूर हैं। रिवायत का कहना है कि गर्मी शुरू होने से पहले ही टॉयलेट नीचे चला गया है और चापाकल भी फर्नीचर में लग गए हैं, जिससे हालात और खराब हो गए हैं।
ग्रामीण महिला सुराही देवी और सोन मती देवी का वर्णन है कि गांव में साफ पानी की भारी भीड़ है। नल-जल योजना के तहत पाइप तो बिछी है, लेकिन नल से पानी कभी नहीं आया। ऐसे में कभी-कभी तालाब के पानी से काम चलाया जाता है।
वहीं वार्ड सदस्य सुशील कुमार का कहना है कि गांव में पानी का स्तर करीब 300 फीट नीचे है, इस कारण हर कोई बोर नहीं हो सकता। उन्होंने बताया कि दो पानी की टंकियां के अलग-अलग हिस्सों के बारे में कई बार याचिका दायर की गई, लेकिन एक मंजिल से ही पानी मिल रहा है, जबकि दूसरी मंजिल से आज तक आपूर्ति शुरू नहीं हो पाई है।
इस मामले में कैमूर लोक स्वास्थ्य मंडल के आर्किटेक्ट रवि प्रकाश ने बताया कि जिले में बंद पड़े 2164 चापाकलों के लिए टीम तैयार की गई है। एक महीने के अंदर सभी चापाकलों को ठीक करने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि गर्मी में लोगों को राहत मिल सके। अब देखिए प्रशासन भारीगांव की पानी की समस्या का स्थायी समाधान कब तक कर पाता है।
