सहरसा जिले के कॉलेज गेट मैदान में इस वर्ष विजयादशमी के अवसर पर रावण दहन कार्यक्रम खासा भव्य होने जा रहा है। आयोजकों ने बताया कि हर साल की तरह इस बार भी दशहरा के मौके पर बड़े पैमाने पर रावण दहन का आयोजन किया जाएगा। इस कार्यक्रम को लेकर तैयारियाँ अंतिम चरण में हैं और मैदान में दिन-रात काम चल रहा है।
जानकारी के अनुसार, इस बार मैदान में 50 फीट ऊँचे रावण, 30 फीट ऊँचे कुंभकरण और 35 फीट ऊँचे मेघनाथ के पुतले तैयार किए जा रहे हैं। यह सभी पुतले कारीगरों और मजदूरों की एक बड़ी टीम ने मिलकर बनाए हैं। इन पुतलों के निर्माण में बाँस, लकड़ी, कागज और रंगीन कपड़ों का उपयोग किया गया है। पुतलों की भव्यता को देखते हुए इस बार का दशहरा लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनने वाला है।
कारीगर बुटन दास, जो इस क्षेत्र में दशकों से रावण पुतला निर्माण के लिए प्रसिद्ध हैं, ने बताया कि वे पिछले 40 वर्षों से इस कार्य में जुड़े हुए हैं। हालांकि, पिछले दो वर्षों से उन्होंने किसी कारणवश पुतले नहीं बनाए थे। लेकिन इस बार आयोजकों के आग्रह और अपने शिल्प कौशल को पुनः प्रदर्शित करने की इच्छा से उन्होंने पूरे उत्साह के साथ इस कार्य को किया है। बुटन दास ने कहा कि इन पुतलों के निर्माण में लाखों रुपये की लागत आई है और इन्हें पूरी मजबूती के साथ तैयार किया गया है ताकि दहन के समय दर्शकों को एक भव्य दृश्य देखने को मिले।
आयोजक मंडल ने बताया कि विजयादशमी का यह कार्यक्रम 2 अक्टूबर की शाम आयोजित किया जाएगा। उस दिन सहरसा शहर ही नहीं, बल्कि आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी हजारों की संख्या में लोग यहाँ जुटेंगे। भीड़ को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा और व्यवस्था को लेकर विशेष तैयारियाँ शुरू कर दी हैं। पुलिस बल की तैनाती, यातायात व्यवस्था और आपात स्थिति से निपटने के लिए चिकित्सा दल की व्यवस्था भी की जा रही है।
स्थानीय नागरिकों में इस आयोजन को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा है। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक रावण दहन का इंतजार कर रहे हैं। मैदान में रोजाना बड़ी संख्या में लोग पुतलों को देखने पहुँच रहे हैं और फोटो खिंचवा रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि इतने बड़े पैमाने पर तैयार किए जा रहे पुतले लंबे समय तक यादगार रहेंगे।
विजयादशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। रावण दहन कार्यक्रम इसी संदेश को प्रसारित करता है। इस बार सहरसा में आयोजित होने वाला यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक होगा बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी पूरे इलाके के लोगों को जोड़ने का काम करेगा।
