“माई, पैसा नहीं है… कल से कुछ नहीं खाया… चावल-आटा के साथ चना-मकई भूंज कर भेज दो, वही खाकर पढ़ने चला जाया करूंगा…” बेटे के ये शब्द आज भी मां की आंखें नम कर देते हैं। यह कहानी है बिहार के गया जिले से करीब 80 किलोमीटर दूर डुमरिया प्रखंड के मैगरा इलाके के रहने वाले सब इंस्पेक्टर अमित कुमार की, जिनकी सफलता संघर्ष की मिसाल बन चुकी है।
अमित का बचपन नक्सल प्रभावित क्षेत्र में बीता। उनके गांव देवजरा में एक समय नक्सलियों का वर्चस्व था। चारों ओर डर और असुरक्षा का माहौल था, लेकिन उनके माता-पिता ने हर हाल में बेटे को बुरे माहौल से दूर रखा। गरीबी इतनी थी कि कई बार घर में चूल्हा जलाने तक के पैसे नहीं होते थे। परिवार मिट्टी के घर में रहता था।
बच्चों की पढ़ाई के लिए अमित के पिता ने गांव छोड़कर मैगरा बाजार में छोटा सा ठिकाना बनाया। उधार और कर्ज लेकर एक छोटी दुकान खोली। पिता मजदूरी करते और मां दुकान संभालतीं। उसी दुकान और मेहनत की कमाई से अमित की पढ़ाई आगे बढ़ी।
एक समय ऐसा भी आया जब आर्थिक हालत बेहद खराब हो गई। इंटरमीडिएट के दौरान पिता ने साफ कह दिया कि आगे की पढ़ाई कराना संभव नहीं है। लेकिन उस वक्त अमित ने हार नहीं मानी। उन्होंने पिता का हौसला बढ़ाया और खुद मेहनत कर आगे बढ़ने का फैसला किया। पढ़ाई के साथ मजदूरी की, फिर छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया।
अमित ने ग्रेजुएशन के पहले साल से ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी थी। पहले प्रयास में तकनीकी कारणों से सब इंस्पेक्टर का रिजल्ट रुक गया, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। लगातार मेहनत का परिणाम यह हुआ कि एक साथ दो बड़ी सफलताएं मिलीं। उनका चयन बिहार पुलिस में सब इंस्पेक्टर के पद पर हुआ, वहीं भारत सरकार के रेलवे विभाग में स्टेशन मास्टर पद पर भी सफलता हासिल की।
अमित बताते हैं कि जब नौकरी में देरी हुई तो लोगों ने ताने भी मारे, लेकिन उन्होंने उन बातों को अपनी ताकत बना लिया। उनका सपना बचपन से पुलिस सेवा में जाने का था, क्योंकि उन्होंने अपने गांव में पुलिस को काम करते करीब से देखा था।
गया में तैयारी के दौरान अमित ने सिर्फ खुद पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि 50 युवाओं का एक ग्रुप बनाकर सामूहिक पढ़ाई शुरू करवाई। उनकी मेहनत से 40 से ज्यादा युवा आज सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं।
फिलहाल अमित बिहार पुलिस में अपनी सेवा दे रहे हैं और साथ ही यूपीएससी और बीपीएससी की तैयारी भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि गरीबी सफलता में बाधा नहीं है, बस हौसला और मेहनत नहीं टूटनी चाहिए। फटे कपड़े, भूख और तानों के बीच भी अगर इंसान डटा रहे, तो सफलता एक दिन जरूर मिलती है।
आज अमित कुमार हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।
