राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. विकास दास के अनुसार, लीची पकने के समय औसत तापमान अधिक होने से लीची का रंग बदला है।
बीज का आकार बढ़ गया और लीची पहले से छोटी हो गई। इसके स्वाद में भी अंतर आने लगा है। चटक रंग नहीं आने और फल का आकार छोटा होने से व्यापारियों को प्रति कार्टन दो से तीन सौ रुपये का नुकसान हो रहा है।
शाही लीची की हालत देखकर किसान चाइना लीची को बचाने के लिए विशेषज्ञों की राय ले रहे हैं। बदलते मौसम के अनुरूप शाही लीची के पौधे तैयार करना होगा।
पौधा संरक्षण विभाग के सहायक निदेशक राधेश्याम कुमार ने बताया कि जलवायु परिवर्तन से लीची किसानों को इस बार परेशानी हो रही है।
18 से 20 मई को पकने वाली लीची में तापमान बढ़ने से 10 मई से ही लालिमा आ गई।
लीची पकने के समय 35 डिग्री की जगह पारा 41 डिग्री पर पहुंच गया। इससे लीची का छिलका झुलस गया और रंग लाल की जगह बादामी हो गया।
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