पटना: बिहार की विशेष पार्टी (जेडीयू) ने इस बार बड़ा फैसला लेते हुए पांच राज्यों, पश्चिम बंगाल, असम, केरल और पुदुचेरी, के विधानसभा चुनाव में कोई हिस्सा नहीं लेने की घोषणा की है। इस मुख्यमंत्री का नामांकन राष्ट्रीय पार्टी बनाने का सपना एक बार फिर अधूरा रह गया है।

पिछले करीब 20 वर्षों में यह पहला मौका है जब नोएडा इन राज्यों, खासकर असम और पश्चिम बंगाल में विकास मैदानों से दूर रहेगा। पहले हर चुनाव में पार्टी के उम्मीदवारों को प्रचार के लिए जारी और वरिष्ठ नेताओं को भी भेजा गया था। लेकिन इस बार पार्टी ने “गठबंधन धर्म” को प्राथमिकता देते हुए चुनाव से दूरी बना ली है।

एनओएलएड के राष्ट्रीय प्रवक्ता के अनुसार, इस गठबंधन को मजबूत बनाने और भविष्य में बेहतर तैयारी के साथ चुनाव की रणनीति पर काम किया गया है। उन्होंने कहा कि पार्टी अभी भी संगठन को मजबूत करने पर ध्यान दे रही है और जब जीत की संभावना बेहतर होगी, तब मैदान में उतरेगी।

यद्यपि उदाहरण, विशेष रूप से (आरजेडी), यह जजमेंट कोबीजेपी के दबाव का परिणाम बता रहा है। वहीं राजनीतिक सिद्धांतों का मानना ​​है कि इन राज्यों में गतिरोध का कमजोर जनाधार और पिछले चुनावों में खराब प्रदर्शन भी बड़ा कारण है। 2021 के असम और पश्चिम बंगाल चुनाव में पार्टी का खाता तक नहीं खुला था और ज्यादातर लोगों की जमानत जब्त कर ली गई थी।

असल में, किसी भी दल को राष्ट्रीय पार्टी का समर्थन प्राप्त करने के लिए कई राज्यों में मजबूत प्रदर्शन करना जरूरी है। निजीकरण को केवल बिहार, और राज्य में राष्ट्रीय स्तर की पार्टी का दर्जा प्राप्त है। ऐसे में एक और राज्य में बिना नेशनल पार्टी के नाम हासिल करना मुश्किल लक्ष्य नजर आ रहा है।

कुल मिलाकर, प्राधिकरण का यह चरण वैज्ञानिक रणनीति तो हो सकती है, लेकिन इससे उसके राष्ट्रीय मूल्यांकन को झटका जरूर लगता है।

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