भारत में घरों में खाना पकाने के तरीके पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदले हैं। जहां पहले ग्रामीण इलाकों में लकड़ी, गोबर और फसल के अवशेष जैसे पारंपरिक ईंधनों का उपयोग होता था, वहीं अब उनकी जगह धीरे-धीरे स्वच्छ ईंधन ने ले ली है। इस बदलाव में सबसे बड़ा योगदान लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) का रहा है। पिछले एक दशक में सरकार की योजनाओं और वितरण नेटवर्क के विस्तार ने LPG को लगभग हर घर तक पहुंचा दिया है। हालांकि, पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) अभी भी सीमित दायरे में है और मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित है।

भारत में स्वच्छ कुकिंग फ्यूल को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कई बड़े कदम उठाए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण योजना प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) रही है, जिसने गरीब और ग्रामीण परिवारों को मुफ्त या सब्सिडी वाले LPG कनेक्शन प्रदान किए। इस योजना के कारण लाखों घरों में पहली बार स्वच्छ ईंधन का इस्तेमाल शुरू हुआ। इससे न केवल महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार हुआ, बल्कि पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा।

LPG की सफलता का एक बड़ा कारण इसकी आसान उपलब्धता और परिवहन क्षमता है। सिलेंडर को सड़क मार्ग से देश के किसी भी कोने में पहुंचाया जा सकता है। इसके विपरीत, PNG की आपूर्ति पाइपलाइन के जरिए होती है, जिसके लिए बड़े स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होती है। यही वजह है कि PNG का विस्तार धीमा है और यह अभी भी कुछ चुनिंदा शहरों तक सीमित है।

अगर हम पिछले 30 वर्षों के आंकड़ों को देखें, तो भारत में LPG की खपत में जबरदस्त वृद्धि हुई है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के अनुसार, 1998-99 में जहां LPG की खपत 446,000 मीट्रिक टन थी, वहीं 2025-26 तक यह लगभग छह गुना बढ़ने का अनुमान है। 2000 और 2010 के दशक में यह वृद्धि सबसे तेज रही, जब सालाना खपत 8 से 11 प्रतिशत की दर से बढ़ी।

2016-17 में PMUY की शुरुआत के बाद LPG की खपत में और तेजी आई। उस समय साल-दर-साल लगभग 10.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इसका मुख्य कारण लाखों नए घरों का LPG से जुड़ना था। हालांकि, 2020 के बाद इस वृद्धि की गति कुछ धीमी हो गई है, क्योंकि अब अधिकांश घरों में LPG कनेक्शन पहले से ही मौजूद हैं।

PMUY से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक ईंधनों पर भारी निर्भरता थी। लेकिन इस योजना ने स्थिति को पूरी तरह बदल दिया। अब गांवों में भी LPG एक सामान्य विकल्प बन गया है। हालांकि, एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्रामीण घरों में LPG का उपयोग शहरी क्षेत्रों की तुलना में कम होता है। इसका कारण आय का स्तर और खरीदने की क्षमता है।

आय और खपत के बीच सीधा संबंध देखने को मिलता है। जिन राज्यों में आय अधिक है, वहां प्रति घर LPG की खपत भी ज्यादा है। वहीं, कम आय वाले राज्यों में लोग LPG का इस्तेमाल सीमित मात्रा में करते हैं और कई बार पारंपरिक ईंधनों का भी सहारा लेते हैं।

जब हम कुल LPG खपत और प्रति घर खपत की तुलना करते हैं, तो एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे बड़े और अधिक आबादी वाले राज्यों में कुल LPG खपत सबसे ज्यादा है, लेकिन प्रति घर औसत खपत के मामले में ये राज्य काफी पीछे हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में प्रति माह 377.4 TMT की खपत के बावजूद प्रति घर खपत के मामले में यह देश में 22वें स्थान पर है।

यह दर्शाता है कि केवल कनेक्शन होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका नियमित उपयोग भी महत्वपूर्ण है।

अब अगर PNG की बात करें, तो इसकी वृद्धि पूरे देश में समान नहीं है। पश्चिमी भारत इस मामले में सबसे आगे है। गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में PNG का अच्छा विस्तार हुआ है। गुजरात में PNG की पहुंच लगभग 39.7 प्रतिशत है, जो देश में सबसे अधिक है। वहीं महाराष्ट्र में भी लाखों कनेक्शन हैं।

उत्तरी भारत में PNG की स्थिति मध्यम है। दिल्ली में इसकी पहुंच करीब 29.3 प्रतिशत है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह अभी सीमित है। पूर्वी भारत, जिसमें बिहार और पश्चिम बंगाल शामिल हैं, वहां PNG की पहुंच बहुत कम है। इसका मुख्य कारण पाइपलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है।

दक्षिण भारत में भी PNG का विस्तार सीमित है। हालांकि यहां LPG का उपयोग व्यापक है, लेकिन पाइप्ड गैस नेटवर्क अभी बड़े शहरों तक ही सीमित है। नॉर्थ-ईस्ट क्षेत्र में तो PNG की पहुंच बेहद कम है, जिसका कारण भौगोलिक चुनौतियां और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है।

भारत में LPG के विस्तार के साथ-साथ इसका वितरण नेटवर्क भी तेजी से बढ़ा है। 2014 में जहां LPG कनेक्शन 14.52 करोड़ थे, वहीं अब यह बढ़कर 32.83 करोड़ हो गए हैं। डिस्ट्रीब्यूटर की संख्या भी लगभग दोगुनी हो गई है, जिनमें से 90 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाएं दे रहे हैं।

PAHAL योजना के तहत 30 करोड़ से अधिक उपभोक्ताओं को सीधे बैंक खाते में सब्सिडी दी जा रही है। वहीं ‘गिव इट अप’ अभियान के तहत करोड़ों लोगों ने स्वेच्छा से सब्सिडी छोड़ दी है, जिससे जरूरतमंदों को अधिक लाभ मिल सका है।

उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों में LPG के उपयोग में लगातार वृद्धि हो रही है। 2019-20 में जहां प्रति वर्ष औसतन 3.01 सिलेंडर का उपयोग होता था, वहीं 2024-25 तक यह बढ़कर 4.34 सिलेंडर हो गया है। यह दर्शाता है कि लोग धीरे-धीरे LPG पर अधिक निर्भर हो रहे हैं।

हालांकि, इस पूरे विस्तार के साथ एक बड़ी चुनौती भी जुड़ी है—ऊर्जा सुरक्षा। भारत अपनी LPG जरूरतों का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है, और इसका अधिकांश हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट के जरिए आता है। यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण मार्ग है। यहां किसी भी प्रकार की बाधा भारत के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकती है।

इसी जोखिम को कम करने के लिए भारत प्राकृतिक गैस इंफ्रास्ट्रक्चर पर तेजी से काम कर रहा है। 2014 में जहां गैस पाइपलाइन की लंबाई 15,340 किलोमीटर थी, वहीं 2024 तक यह बढ़कर लगभग 25,000 किलोमीटर हो गई है। आने वाले वर्षों में और भी पाइपलाइन जोड़ने की योजना है।

सरकार सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क का विस्तार कर रही है और पाइपलाइन टैरिफ को एक समान बनाने की दिशा में काम कर रही है, ताकि PNG को सस्ता और अधिक सुलभ बनाया जा सके।

इन सभी प्रयासों के बावजूद भारत एक “डुअल एनर्जी ट्रांजिशन” के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ LPG ने लगभग हर घर तक पहुंच बना ली है, वहीं दूसरी तरफ PNG का विस्तार अभी भी सीमित है। इसका मतलब है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में लोग LPG पर निर्भर रहेंगे, जबकि शहरी क्षेत्रों में धीरे-धीरे PNG का उपयोग बढ़ेगा।

अंततः, भारत का लक्ष्य गैस-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना है, लेकिन इसके लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और नीतिगत समर्थन की आवश्यकता होगी। जब तक PNG का नेटवर्क देशभर में नहीं फैलता, तब तक LPG ही भारत के किचन का मुख्य ईंधन बना रहेगा।

इस पूरी तस्वीर से यह स्पष्ट है कि भारत ने स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल की है, लेकिन आगे का रास्ता अभी भी चुनौतियों से भरा हुआ है।

 

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