पटना: एक बार फिर जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन रहे हैं। 2003 में पार्टी गठन के बाद से ही वे संगठन और सरकार दोनों पर मजबूत पकड़ बनी रही। बीच-बीच में, और को राष्ट्रपति बनाया गया, लेकिन अब कमान फिर से पूरी तरह से नवीनता के हाथ में है।

हाल ही में समाजवादी पार्टी के सदस्य चुनने के बाद यह चर्चा तेज है कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद छोड़ सकते हैं। हालांकि राजनीतिक विद्वानों का मानना ​​है कि वे दिल्ली जाने के बावजूद बिहार सरकार पर अपनी पकड़ नहीं बना पाएंगे।

नोएडा के इतिहास पर नजर डालें तो 2003 में पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे। इसके बाद 2006 से शरद यादव को यह जिम्मेदारी मिली। 2013 में पार्टी संविधान में बदलाव कर उन्हें तीन बार राष्ट्रपति बनाया गया, लेकिन 2016 में उन्हें पद से नवाजा गया। इसके बाद नीतीश ने कमान संभाली और 2020 में इसे आरसीपी सिंह को सौंप दिया गया। बाद में यह जिम्मेदारी ललन सिंह की चली गई, लेकिन 2023 में फिर नीतीश राष्ट्रपति बन गए।

अब वे तीसरी बार राष्ट्रपति बनने की तैयारियों में हैं और इस बार भी उनके सामने कोई चुनौती नहीं दिख रही है। 22 मार्च नामांकन की अंतिम तिथि है, जबकि 27 मार्च को चुनाव प्रस्तावित है। राष्ट्रीय परिषद की बैठक की घोषणा 29 मार्च को हो सकती है।

विशेषज्ञ का कहना है, नीतीश कुमार का यह निर्णय तय है। वे केवल एक ही पार्टी को एकजुट रखना चाहते हैं, बल्कि बिहार और केंद्र की राजनीति में भी संतुलन बनाए रखना चाहते हैं। साथ ही उनके बेटे निशांत की राजनीति में एंट्री के बाद यह भी माना जा रहा है कि वे धीरे-धीरे उन्हें तैयार कर रहे हैं।

कुल मिलाकर, मुख्यमंत्री पद छोड़ने की अटकलों के बीच भी यह साफ है कि नोएडा और बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की भूमिका अभी खत्म होने वाली नहीं है।

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