होली का रंग हर किसी के लिए अलग होता है। कहीं गुलाल की मस्ती, कहीं फूलों की होली, तो कहीं कीचड़ में सराबोर उत्साह। लेकिन इन सब से अलग एक ऐसी होली भी है, जो रंगों से नहीं, बल्कि राख से खेली जाती है। जी हां, बात हो रही है ‘मसानी होली’ की। काशी के बाद अब बिहार के वैशाली में भी यह परंपरा पिछले चार वर्षों से निभाई जा रही है। इस बार आयोजन और भी भव्य और व्यापक होने जा रहा है।
वैशाली की पावन धरती पर गंगा और गंडक के संगम स्थल कौनहारा घाट पर आज रात 9 बजे से ‘मसान प्रवेश’ की मर्यादा के साथ इस अनोखे उत्सव की शुरुआत होगी। आयोजकों के अनुसार, यह सिर्फ होली नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के दर्शन का आध्यात्मिक पर्व है।
मां तारा तंत्रपीठ के महंत श्री महाकाल बाबा ने बताया कि इस होली में चिताओं की ताजी और शांत भस्म का उपयोग किया जाएगा। श्मशान से एकत्र की गई भस्म को विशेष विधि से छाना जाएगा, ताकि केवल रेशम जैसी बारीक राख ही शेष रहे। इसके बाद उसे पवित्र मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाएगा। उनका कहना है कि जो भस्म महादेव को प्रिय है, वह अपवित्र कैसे हो सकती है? तंत्र शास्त्रों में चिता भस्म को परम पवित्र माना गया है।
मसान होली का आयोजन उसी रहस्यमयी भूमि पर होता है, जहां कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर ‘भूतों का मेला’ भी लगता है। मान्यता है कि यहां आने से नकारात्मक ऊर्जा और बाधाओं से मुक्ति मिलती है। इस बार बिहार के विभिन्न जिलों से श्मशान परंपरा और मसानी देवता के उपासक साधक भी शामिल होंगे।
शाम के समय बाल गोपाल की मटका होली, ब्रज की लड्डू होली और मथुरा-वृंदावन की लठमार होली की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होंगी। इन सबके बाद रात गहराते ही चिता भस्म की होली शुरू होगी, जो ‘हरि’ और ‘हर’ के मिलन का प्रतीक मानी जाती है।
आयोजन को और खास बनाने के लिए इस साल 35 भव्य झांकियां निकाली जाएंगी। इनमें भोलेनाथ, मां तारा और मां काली के प्रतीकात्मक स्वरूपों के साथ शिवलोक की झलक देखने को मिलेगी। श्रद्धालु भूत, प्रेत और बेताल के वेश में नजर आएंगे। घाट पर प्रतीकात्मक रूप से चिता की लकड़ियों का घेरा बनाया जाएगा, जिसके बीच भक्ति की ज्वाला और श्रद्धालुओं का उत्साह इस माहौल को अलौकिक बना देगा।
हालांकि आयोजकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिन लोगों को चिता भस्म से होली खेलने में संकोच है, उनके लिए अबीर-गुलाल की अलग से व्यवस्था की गई है।
‘मसान’ यानी श्मशान। यह होली हमें याद दिलाती है कि अंततः मनुष्य को राख ही होना है। यह उत्सव मृत्यु के सन्नाटे को भक्ति के उत्सव में बदलने का प्रतीक है—मोह-माया से मुक्ति और आत्मा की अमरता का संदेश।
आज रात जब कौनहारा घाट पर राख उड़ेगी, तो सवाल सिर्फ इतना नहीं होगा कि कौन खेलेगा होली… बल्कि यह भी कि कौन समझ पाएगा जीवन और मृत्यु का यह अनोखा दर्शन।
