जिस उम्र में बच्चे ठीक से चलना भी नहीं सीख पाते, उस महज 3 साल की उम्र में Sunita Chaudhary का बाल विवाह कर दिया गया। बचपन जिम्मेदारियों में बीत गया, लेकिन उनके दिल में एक सपना था—अफसर बनने का।
18 साल की उम्र होते-होते जब ससुराल जाने का दबाव बढ़ा, तब उन्होंने समाज की परवाह किए बिना अपने पिता से पढ़ने की जिद की। यही जिद उनके संघर्ष की शुरुआत बनी। 5 साल की उम्र से शुरू हुई पढ़ाई का सफर आसान नहीं था। दिनभर खेतों में काम और रात को लालटेन की रोशनी में पढ़ाई—यही उनकी दिनचर्या बन गई।
गांव वालों के ताने, आर्थिक तंगी और रोज 6 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाना—हर मुश्किल उनके हौसले के सामने छोटी पड़ती गई। उनकी मेहनत का नतीजा 10वीं में डिस्टिंक्शन के रूप में सामने आया।
इसके बाद उन्होंने पुलिस भर्ती का फॉर्म भरा। जब रिजल्ट आया, तो 50 सफल उम्मीदवारों में वह अकेली महिला थीं। इस उपलब्धि के साथ Sunita Chaudhary अपने गांव की पहली महिला कांस्टेबल बन गईं।
लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी। खाकी वर्दी पहनने के कुछ ही समय बाद उन्हें स्टेज-2 कैंसर होने का पता चला। यह उनके जीवन का सबसे कठिन दौर था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और 6 महीने की लंबी लड़ाई के बाद कैंसर को मात दे दी।
स्वस्थ होते ही उन्होंने फिर से ड्यूटी जॉइन की और समाज के लिए काम करना शुरू किया। खासकर बच्चों को यौन शोषण और सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूक करने का मिशन उन्होंने अपना लक्ष्य बना लिया।
उनके इस समर्पण और निस्वार्थ सेवा के कारण बच्चे उन्हें प्यार से ‘पुलिसवाली दीदी’ कहने लगे। अब तक वह 1000 से ज्यादा बच्चों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव ला चुकी हैं।
आज Sunita Chaudhary सिर्फ एक पुलिसकर्मी नहीं, बल्कि लाखों लड़कियों के लिए हिम्मत, संघर्ष और सफलता की जीवित मिसाल हैं।
