पटना: बिहार में पिछले कुछ समय से शराबबंदी को जारी रखने या हटाने को लेकर बहस तेज हो गई है। हालांकि की पहल पर लागू इस कानून को जनता दल यूनाइटेड अब भी जारी रखने के पक्ष में है। लेकिन संभावित सत्ता परिवर्तन के बाद यह फैसला नए मुख्यमंत्री के हाथ में होगा कि इस नीति में बदलाव किया जाए या नहीं।

साल 2016 में लागू हुई शराबबंदी का उद्देश्य महिलाओं की मांग को पूरा करना और घरेलू हिंसा को कम करना था। आंकड़ों के मुताबिक, इस कानून के बाद घरेलू हिंसा के मामलों में गिरावट आई है—2015 में जहां करीब 15 हजार मामले थे, वहीं 2024 तक यह घटकर लगभग 7500 रह गए।

हालांकि, शराबबंदी के दूसरे पहलू भी सामने आए हैं। राज्य में अवैध शराब का कारोबार जारी है, जिससे जहरीली शराब की घटनाएं बढ़ी हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्षों में सैकड़ों लोगों की मौत जहरीली शराब पीने से हुई है। भागलपुर, सिवान और छपरा जैसे जिलों में बड़े हादसे भी हो चुके हैं।

कानून के तहत अब तक लाखों लोगों पर कार्रवाई हुई है। 6.61 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए, 9 लाख से ज्यादा गिरफ्तारियां हुईं और हजारों वाहनों की नीलामी की गई। इसके बावजूद तस्करी पूरी तरह नहीं रुक सकी है।

राजनीतिक स्तर पर भी मतभेद दिखते हैं। आरजेडी का कहना है कि शराबबंदी पूरी तरह सफल नहीं रही और इससे गरीब व दलित वर्ग अधिक प्रभावित हुआ है। वहीं, सरकार और मद्य निषेध विभाग इसे आंशिक रूप से सफल बताते हैं, खासकर महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक सुधार के संदर्भ में।

विशेषज्ञों का मानना है कि शराबबंदी से सामाजिक लाभ जरूर हुआ है, लेकिन राजस्व में नुकसान और अवैध नेटवर्क का बढ़ना बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे में आने वाले समय में सरकार को संतुलित और प्रभावी रणनीति बनाने की जरूरत होगी।

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