सहरसा में रामनवमी के पावन अवसर पर गंगा-जमुनी तहज़ीब की अनोखी झलक देखने को मिल रही है। जहां एक तरफ हिंदू समाज भगवान श्रीराम और बजरंगबली की भक्ति में लीन है, वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय भी इस पर्व में अपनी भागीदारी निभाकर भाईचारे का संदेश दे रहा है।
रामनवमी को लेकर शहर के बाजारों में खास रौनक है। मंदिरों और घरों में पूजा-अर्चना की तैयारी जोरों पर है। इस बीच बाजार में कई ऐसे मुस्लिम दरजी हैं, जो वर्षों से इस पर्व के लिए ध्वज, पताका, लंगोट और अन्य पूजन सामग्री तैयार करते आ रहे हैं। वे पूरी निष्ठा और मेहनत के साथ इन वस्त्रों को सिलते हैं, जिसे हिंदू श्रद्धालु बड़े सम्मान के साथ खरीदकर भगवान को अर्पित करते हैं।
यह परंपरा नई नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही है। इन दरजियों का कहना है कि यह काम उनके लिए सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि आपसी प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। वहीं, स्थानीय लोग भी बताते हैं कि वे बिना किसी भेदभाव के हर साल इन्हीं से पूजा सामग्री बनवाते हैं।
एक ओर जहां देश के कई हिस्सों में धर्म के नाम पर लोगों को बांटने की कोशिश होती है, वहीं सहरसा की यह तस्वीर एक अलग ही संदेश देती है। यहां के लोग यह साबित कर रहे हैं कि धर्म से ऊपर इंसानियत और आपसी सम्मान है।
गौरतलब है कि सिर्फ रामनवमी ही नहीं, बल्कि ईद जैसे मुस्लिम पर्वों पर भी हिंदू समुदाय बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है। कई जगहों पर हिंदू भाई मुस्लिम समुदाय का स्वागत फूल बरसाकर करते नजर आते हैं, जिसके वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके हैं।
सहरसा की यह अनूठी मिसाल न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत है। यह बताती है कि भारत की असली पहचान उसकी विविधता में एकता और भाईचारे की मजबूत परंपरा में ही बसती है।
