मुजफ्फरपुर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। एक ओर बिहार सरकार ने शिक्षा के लिए 68 हजार करोड़ से अधिक का बजट तय किया है, वहीं दूसरी ओर औराई प्रखंड के मधुबन प्रताप गांव का मध्य विद्यालय आज भी झोपड़ी में चल रहा है।

इस स्कूल में कक्षा एक से आठ तक के बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन उनके पास पक्की इमारत नहीं है। टीन शेड और अस्थायी ढांचे के नीचे किसी तरह पढ़ाई कराई जा रही है। गर्मी में टीन की छत तपती है, तो बारिश में छत से पानी टपकता रहता है। ऐसे हालात में पढ़ाई करना बच्चों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।

स्कूल में लगभग 153 बच्चे नामांकित हैं, जिनमें से रोजाना 100 से अधिक बच्चे पढ़ने आते हैं। हैरानी की बात यह है कि यहां सिर्फ तीन शिक्षक हैं, जो सभी कक्षाओं को संभालते हैं। जगह की कमी के कारण एक ही कमरे में कई कक्षाओं के बच्चों को एक साथ पढ़ाया जाता है।

छात्रा यांशी कुमारी बताती हैं कि पढ़ाई करने में काफी परेशानी होती है। बारिश में ऊपर से पानी टपकता है और गर्मी में बैठना मुश्किल हो जाता है। वहीं, मध्याह्न भोजन बनाने वाली सुनीता देवी कहती हैं कि टीन शेड के नीचे खाना बनाना बेहद कठिन होता है, खासकर गर्मी के मौसम में।

विद्यालय के प्रधानाध्यापक राजेश कुमार के अनुसार, इस स्कूल की स्थापना 1972 में हुई थी। पहले यहां पक्के कमरे थे, लेकिन बाढ़ में वे ध्वस्त हो गए। तब से हर साल अस्थायी छप्पर बनाकर स्कूल चलाया जा रहा है। उन्होंने कई बार विभाग को इस समस्या की जानकारी दी, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

स्थानीय ग्रामीण भी इस स्थिति को लेकर चिंतित हैं और जल्द स्थायी भवन निर्माण की मांग कर रहे हैं। जिला शिक्षा पदाधिकारी का कहना है कि भवनहीन स्कूलों की रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी गई है और स्वीकृति मिलते ही निर्माण कार्य शुरू होगा।

फिलहाल, सवाल यही है कि आखिर कब तक ये बच्चे झोपड़ी में बैठकर अपने भविष्य को संवारने की कोशिश करते रहेंगे?

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