गर्मी से एक अच्छी और राहत भरी खबर सामने आ रही है। यदि आप किसी बीमारी से परेशान हैं और चावल-आलू खाने से संबंधित हैं, तो आने वाले समय में आपके लिए बेहतर विकल्प उपलब्ध हो सकता है। बिहार में जल्द ही काले आलू और काले चावल की खेती शुरू होने जा रही है, जो स्वास्थ्य के दावों से बहुत खतरनाक माने जा रहे हैं।
अब तक आपने सॉसेज़ में सफेद चावल और सामान्य आलू की खेती देखी होगी, लेकिन आने वाले दिनों में आप जायनी रंग के आलू और काले चावल भी देख सकते हैं। ये दोनों फसलें पारंपरिक डेटाबेस से अलग-अलग हैं और पोषण से लेकर असमानताएं निर्धारित की जा रही हैं।
काले आलू की बात करें तो इसका रंग जामिन जितना गहरा होता है और आकार सामान्य आलू से थोड़ा मोटा होता है। इसमें विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा अधिक पायी जाती है। विशेषज्ञ के अनुसार, यह थोक विक्रेताओं के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है, हालांकि इसकी सीमित मात्रा में भी सेवन की सलाह दी जा रही है। आईटीसी ट्रायल चल रहा है और कुछ किसान बाहर से बीज मंगाकर इसकी खेती भी शुरू कर चुके हैं।
वहीं काला चावल भी पोषण के मामले में काफी खस्ता है। प्रारंभिक शोध में पाया गया है कि आयरन, स्टोन और चॉकलेट की मात्रा सफेद चावल के घटकों में अधिक होती है। यही कारण है कि इसे मधुमेह और हृदय रोग के लिए चुना जा रहा है।
कृषि विशेषज्ञ का मानना है कि अगर ये दोनों फसलें बिहार में सफल रहीं तो ये किसानों के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती हैं। बाजार में अच्छी कीमत मिलने की संभावना है, जिससे किसानों की आय भी अधिक हो जाएगी।
कुल मिलाकर, काला आलू और काला चावल की खेती और खेती—दोस्तों के क्षेत्र में नई फसलें वाले साबित हो सकते हैं।
