बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव की आहट सुनाई देने लगी है। लगभग दो दशकों से अधिक समय तक मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चाओं ने सियासी गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। पटना से लेकर दिल्ली तक इस संभावित सत्ता परिवर्तन को लेकर राजनीतिक दलों और विश्लेषकों के बीच चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। माना जा रहा है कि बिहार की राजनीति अब धीरे-धीरे ‘पोस्ट-नीतीश’ दौर की ओर बढ़ रही है।
जानकारों के अनुसार इस पूरे सियासी घटनाक्रम का अहम पड़ाव 10 अप्रैल के आसपास देखने को मिल सकता है। दरअसल वर्तमान राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हो रहा है, जिसके बाद नव निर्वाचित सदस्य शपथ लेंगे। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि नीतीश कुमार 10 अप्रैल तक मुख्यमंत्री पद पर बने रह सकते हैं। हालांकि अगले मुख्यमंत्री को लेकर अभी से राजनीतिक मंथन शुरू हो गया है, लेकिन किसी बड़े फैसले की आधिकारिक घोषणा फिलहाल नहीं हुई है।
इस बीच सियासी चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा था कि नीतीश कुमार दिल्ली जाकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में बड़ी जिम्मेदारी संभाल सकते हैं, लेकिन फिलहाल ऐसी संभावना कम बताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार उनका राजनीतिक आधार पटना ही रहेगा और वे संसद सत्र के दौरान ही दिल्ली जाएंगे। यानी बिहार की राजनीति पर उनकी नजर बनी रहेगी।
नीतीश कुमार के पद छोड़ने की संभावनाओं के बीच बिहार में बीजेपी की भूमिका भी मजबूत होती नजर आ रही है। सूत्रों के मुताबिक नए सत्ता समीकरण में मुख्यमंत्री पद बीजेपी के खाते में जा सकता है। वहीं मंत्रिमंडल के गठन में बीजेपी और जेडीयू को बराबर-बराबर 15-15 मंत्री पद मिलने की चर्चा है। इसके अलावा सहयोगी दलों को भी प्रतिनिधित्व देने की तैयारी है, जिसमें एलजेपी (रामविलास) को दो, आरएलएम को एक और हम पार्टी को एक कैबिनेट पद मिलने की संभावना जताई जा रही है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और चर्चा ने सियासत को गर्म कर दिया है। बताया जा रहा है कि नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार की भी राजनीति में औपचारिक एंट्री हो सकती है। यहां तक कि उन्हें जेडीयू की ओर से उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की अटकलें भी लगाई जा रही हैं। हालांकि इन चर्चाओं की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
उधर विपक्ष ने इस संभावित बदलाव को लेकर सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। आरजेडी ने इसे जनता के जनादेश के साथ धोखा बताते हुए कहा है कि सत्ता परिवर्तन की यह पूरी कवायद जनता की भावना के खिलाफ है। फिलहाल बिहार की राजनीति में अगले कुछ सप्ताह काफी अहम माने जा रहे हैं, जहां सत्ता के नए समीकरण तय हो सकते हैं।
