बिहार, जिसे देश की आत्मा कहा जाता है, 22 मार्च 1912 को बंगाल से अलग होकर एक स्वतंत्र राज्य बना। यह दिन केवल राज्य गठन का प्रतीक नहीं है, बल्कि नई पहचान और समृद्धि की यात्रा की शुरुआत का प्रतीक भी है। इस ऐतिहासिक बदलाव में सच्चिदानंद सिन्हा की भूमिका महत्वपूर्ण रही।
सहरसा में इस वर्ष बिहार दिवस धूमधाम से मनाया जा रहा है। राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, जिला स्कूल सहरसा में सुबह सबसे पहले प्रभात फेरी निकाली गई, उसके बाद परीक्षागृह में तीन दिनों तक स्टॉल सजाए गए। शाम को सरकारी भवनों पर कैंडल जलाकर और नीली बल्ब रोशनी से सजावट की जाएगी। कला-संस्कृति विभाग, शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन के संयुक्त तत्वावधान में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होगा, जिसमें सुप्रसिद्ध गज़ल गायक चंदन दास अपनी मधुर आवाज से लोगों का मनोरंजन करेंगे। साथ ही स्थानीय कलाकार और स्कूली बच्चों द्वारा भी प्रस्तुति दी जाएगी।
बिहार अपनी गौरवशाली विरासत, समृद्ध संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के लिए पूरे देश और दुनिया में जाना जाता है। लिट्टी-चोखा जहां सादगी और स्वाद का प्रतीक है, वहीं बिहार का मखाना ग्लोबल लेवल पर ‘सुपरफूड’ के रूप में प्रसिद्ध है। देश का लगभग 80-90 प्रतिशत मखाना बिहार में उत्पादित होता है।
कला और संस्कृति में बिहार की चित्रकारी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही जाती है। शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन शिक्षा केंद्रों ने इसे ज्ञान का केंद्र बनाया था। धार्मिक दृष्टि से भी बिहार विशेष है। बोधगया में गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया, जबकि भगवान महावीर ने जैन धर्म का प्रचार किया। लोक आस्था का महापर्व छठ सूर्य पूजा और प्रकृति के प्रति श्रद्धा का प्रतीक बन चुका है।
इतिहास में बिहार का प्राचीन नाम मगध था, जहाँ मौर्य और गुप्त जैसे महान साम्राज्यों का उदय हुआ। सम्राट अशोक और चंद्रगुप्त मौर्य जैसे शासकों ने न केवल बिहार, बल्कि पूरे भारत को नई दिशा दी।
बिहार दिवस केवल उत्सव नहीं, बल्कि गौरवशाली अतीत और समृद्ध संस्कृति को याद करने का अवसर है। सहरसा में इस वर्ष भी यह पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है, जिसमें इतिहास, संस्कृति और आधुनिक उत्सव का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है।
