गया/शेखपुरा: मध्य पूर्व में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब भारत की रसोई तक पहुंच गया है. देश के कई मठों में घरेलू उद्योग के गेस्टों की खबरें सामने आ रही हैं। गैस के बाहर लंबी कतारें लग रही हैं और कई जगहों पर गैसों की कालाबाज़ारी भी शुरू हो गई है। बताया जा रहा है कि करीब 900 से 2200 रुपये में मिलने वाला गैस सिलेंडर ब्लैक में 1800 से 2200 रुपये तक जा रहा है, जिससे आम लोगों की परेशानी बढ़ गई है।

हालांकि इस संकट के बीच बिहार के बोधगया जिले से करीब छह किमी दूर स्थित बत्सपुर गांव और शेखपुरा जिले के मदारी गांव ने एक अलग मिसाल पेश की है। यहां के लोग गैस संकट से लगभग बेफिक्र हैं, क्योंकि यहां की रसोई में गोबर गैस से चल रही है।

बत्सपुर गांव के करीब 40 से 50 घरों में पाइपलाइन के माध्यम से गोबर गैस की धारा निकलती है। यह व्यवस्था ‘गोबरधन योजना’ के तहत स्थापित बायोगैस प्लांट से संचालित हो रही है। वहीं शेखपुरा के मदारी गांव में अस्वच्छता अभियान के तहत निरंजना नदी तट पर बायोगैस प्लांट लगाया गया है, जिससे अब 35 घरों तक गैस पहुंच रही है।

बत्सपुर गांव की ललिता देवी का वर्णन है कि पहले उन्हें लकड़ी और उपले जलाने का खाना बनाना पड़ता था, जिससे काफी धुआं निकलता था और परेशानी भी होती थी। गैस भी महंगा था, लेकिन पिछले चार साल से उनके घर में गोबर गैस से ही चूल्हा जल रहा है। अब महीने में सिर्फ 200 से 300 रुपये के खर्च में पूरे परिवार का खाना बन जाता है।

गांव में गैस गैसोलीन की व्यवस्था, शहरों के प्रकार के पाइपलाइन और मीटर की जानकारी दी गई है। गैस की कीमत 25 रुपये प्रति यूनिट है। यहां एक खास नियम यह भी है-जितना गोबर, अत्यधिक गैस। जो परिवार नियमित रूप से प्लांट में गोबर देते हैं, उन्हें गैस कनेक्शन दिया जाता है और गोबर के बदले 50 पैसे प्रति बच्चे का भुगतान भी किया जाता है।

कृषि विज्ञान केंद्र मणिपुर के प्रमुख मनोज कुमार के अनुसार, बायोगैस प्लांट से आशियाने वाली स्लरी में डाइजेस्ट, सैलून और पोटाश जैसे पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा होती है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। इसमें कोई मानकीकृत गैस लेबल नहीं है, बल्कि जैविक खाद भी तैयार है।

और शेखपुरा के ये गांव दिखा रहे हैं कि यदि परिभाषा का अधिकार वैज्ञानिक हो और ग्रामीण खुद पहले करें, तो साधारण संसाधनों जैसे गोबर से भी ऊर्जा उत्पादन कर गांव आत्मनिर्भर बन सकते हैं।

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