बिहार के पूर्णिया जिले से एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जहां अजमती, नुसरत, अचल और छोटी जैसी मूक-बधिर झलक ने अपनी जिंदगी की दिशा बदल दी। जो बच्चे कभी समाज से कटी हुई थी, आज उन बच्चों को सांकेतिक भाषा सिखाई जा रही है।
अजमती खातून जन्म से न सुन सकता था, न बोल सकता था। परिवार के बीच भी वह खुद को अलग महसूस करती थी। लेकिन जब उनके पिता ने उन्हें असोसिएशन में शामिल कर लिया तो उनकी जिंदगी बदल गई। आज वह सातवीं कक्षा में पढ़ती है और सांकेतिक भाषा में अपनी पसंद—गणित—भी बताती है।
छोटी की कहानी भी संघर्ष से भरी है। स्थानीय विद्यालय ने उन्हें दीक्षा से मना कर दिया था, लेकिन कस्तूरबा विद्यालय में उन्हें नया जीवन मिला। वहीं अचल, जिसने पिता को खो दिया, अब टीचर बनने का सपना देख रही है। नुसरत, जिसका मजाक उड़ाया जाता था, आज पढ़ाई और खेल दोनों में आर्टिकल है।
इन बदलावों के पीछे सबसे बड़ा योगदान स्कूल और नई शिक्षण पद्धति का है। यहां स्मार्ट बोर्ड और सांकेतिक भाषा के माध्यम से पढ़ाई कराई जाती है। नेटवर्क को भी विशेष प्रशिक्षण दिया गया, जिसमें और का सहयोग मिला।
प्रारंभ में चुनौती थी क्योंकि शिक्षक भी सांकेतिक भाषा नहीं जानते थे। लेकिन प्रशिक्षण के बाद मोरक्को बदल गया। अब सभी लड़कियां एक साथ पढ़ते हैं और इशारों से संवाद करते हैं।
नतीजे वाला रहा—कुछ ही ग़रीबों में ये बच्चियां 80-90% तक आ गईं। इंडेक्स में भी इंडेक्स जिले और राज्य स्तर पर पहला-दूसरा स्थान हासिल किया।
यह कहानी साबित करती है कि हर बच्चे में क्षमताएं होती हैं, बस सही मार्गदर्शन और अवसर की आवश्यकता होती है। आज इन माता-पिता की आंखों में सपने हैं और उनके पिता के चेहरे पर गर्व की मुस्कान है।
