नई दिल्ली :  DONAld TRUMP, BENJAMIN NETANYAHU और AlI KHAMENI से जुड़ा यह संघर्ष अब सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि डिजिटल और सूचना युद्ध के रूप में भी तेजी से फैल रहा है। इसे आधुनिक दौर का पहला “एआई-प्रभावित युद्ध” माना जा रहा है, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार तस्वीरें, वीडियो, मीम्स और डीपफेक बड़े पैमाने पर हथियार की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस युद्ध में सोशल मीडिया सबसे बड़ा रणक्षेत्र बन चुका है। ईरान ने शुरुआती चरण में इंटरनेट पर नियंत्रण कर एक “सूचना शून्य” तैयार किया, जिसे बाद में एआई-निर्मित कंटेंट और प्रचार से भर दिया गया। इससे भ्रम और मनोवैज्ञानिक दबाव तेजी से बढ़ा। रिपोर्ट्स बताती हैं कि पहले दो हफ्तों में ही 100 से अधिक एआई-जनित वीडियो और तस्वीरें सामने आईं, जिन्हें करोड़ों बार देखा गया।

ईरान का अभियान रणनीतिक रूप से अधिक संगठित माना जा रहा है। इसका उद्देश्य अमेरिकी जनसमर्थन को कमजोर करना, अपनी सैन्य क्षमता दिखाना और विरोधी नेताओं की छवि को नुकसान पहुंचाना है। इसके लिए फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट्स, डीपफेक वीडियो और पॉप-कल्चर आधारित मीम्स का सहारा लिया जा रहा है। खासकर लेगो, कार्टून और बच्चों के शो की शैली में बनाए गए वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं।

वहीं, अमेरिका की प्रतिक्रिया अधिकतर घरेलू दर्शकों तक सीमित नजर आती है। व्हाइट हाउस और उससे जुड़े सोशल मीडिया अकाउंट्स ने गेमिंग, फिल्मों और पॉप कल्चर के क्लिप्स के साथ सैन्य फुटेज मिलाकर वीडियो जारी किए हैं। इससे उन्हें व्यापक पहुंच तो मिली, लेकिन रणनीतिक रूप से इसे असंगत अभियान माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह संघर्ष अब “अटेंशन इकॉनमी” का हिस्सा बन चुका है, जहां वायरल कंटेंट ही सबसे बड़ा प्रभाव डालता है। हालांकि, डीपफेक और गलत सूचनाओं के बार-बार उजागर होने से विश्वसनीयता पर भी असर पड़ रहा है।

कुल मिलाकर, यह युद्ध संकेत देता है कि भविष्य की लड़ाइयां सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि डेटा, तकनीक और सूचना के जरिए भी लड़ी और जीती जाएंगी।

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