नालंदा के अस्थावां विधानसभा क्षेत्र में एक अधूरा पुल पिछले 25 सालों से सरकारी उदासीनता की कहानी बयां कर रहा है। बिंद प्रखंड के ननौर गांव के पास नोनिया नदी पर बनने वाला यह पुल आज भी अधूरा खड़ा है, जबकि इसके अभाव में करीब 50 गांवों के डेढ़ लाख लोग रोज जान जोखिम में डालकर नदी पार करने को मजबूर हैं।
साल 2000 में तत्कालीन विधायक सतीश कुमार ने इस पुल की आधारशिला रखी थी। शुरुआत में थोड़ी बहुत मिट्टी भराई हुई, लेकिन उसके बाद निर्माण कार्य पूरी तरह ठप पड़ गया। सरकारें बदलीं, वादे हुए, लेकिन पुल वहीं का वहीं रह गया।
गांवों के लोगों के लिए यह सिर्फ पुल नहीं, बल्कि जिंदगी और मौत के बीच की लकीर बन चुका है। गर्मियों में लोग पैदल नदी पार कर लेते हैं, लेकिन बरसात में यही नदी उफनकर जानलेवा बन जाती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, पिछले 25 सालों में सैकड़ों लोग नदी पार करते समय डूब चुके हैं।
ग्रामीण परमानंद प्रसाद बताते हैं कि मजबूरी में उन्हें कपड़े भिगोकर तैरते हुए नदी पार करनी पड़ती है। बच्चों की पढ़ाई, मरीजों का इलाज या रोज़गार—हर जरूरत इस खतरनाक रास्ते से होकर गुजरती है।
इस पुल के न बनने से लोगों को 8 किलोमीटर की दूरी तय करने के बजाय 36 किलोमीटर का लंबा चक्कर लगाना पड़ता है। इससे समय, पैसा और सबसे अहम—जान का नुकसान हो रहा है।
स्थानीय युवा रविरंजन ने कई बार प्रशासन और मुख्यमंत्री के जनता दरबार में गुहार लगाई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला। वहीं, स्वतंत्रता सेनानी कौशलेंद्र प्रसाद इसे वोट बैंक की राजनीति का नतीजा बताते हैं।
अब 5 से 5.5 करोड़ रुपये की लागत से नए सिरे से टेंडर पास होने की बात कही जा रही है। प्रशासन का दावा है कि फसल कटते ही निर्माण कार्य शुरू होगा।
फिलहाल, 50 गांवों की निगाहें इस बार सच में पुल बनने पर टिकी हैं। अगर ऐसा हुआ, तो यह सिर्फ एक पुल नहीं, बल्कि हजारों जिंदगियों के लिए सुरक्षित भविष्य की शुरुआत होगी।
