धनबाद के कोयलांचल क्षेत्र में चैती महादुर्गा पूजा पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जा रही है। धनबाद के मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है और हर कोई माँ दुर्गा का आशीर्वाद लेने पहुंच रहा है। इसी बीच झगराही गाँव अपनी लगभग 350 साल पुरानी परंपरा को आज भी जीवित रखे हुए है, जो इसे खास बनाती है।
झगराही गाँव में इस पूजा का इतिहास काफी पुराना और गौरवशाली रहा है। बताया जाता है कि अंग्रेजी शासनकाल से ही यहाँ यह पूजा लगातार आयोजित होती आ रही है। इस परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका पूरा आयोजन गाँव के ब्राह्मण परिवार द्वारा ही किया जाता है। परिवार के हर सदस्य को अलग-अलग जिम्मेदारी दी जाती है, जिससे परंपरा आज भी व्यवस्थित रूप से चल रही है।
माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाने की परंपरा भी पीढ़ियों से चली आ रही है। जिन कारीगरों ने वर्षों पहले प्रतिमा बनाना शुरू किया था, उनके वंशज आज भी उसी स्वरूप में प्रतिमा तैयार करते हैं। पूजा के दौरान कई विशेष नियमों का पालन किया जाता है। खास बात यह है कि दशमी के दिन ही महिलाओं को मंदिर के अंदर प्रवेश की अनुमति दी जाती है।
इस पूजा की एक और अनोखी परंपरा यह है कि माँ दुर्गा को केवल गुड़ से बने प्रसाद का ही भोग लगाया जाता है। साथ ही गाँव की विवाहित बेटियाँ, चाहे वे कहीं भी रहती हों, इस अवसर पर अपने मायके जरूर आती हैं, जिससे पारिवारिक और सामाजिक जुड़ाव मजबूत होता है।
अष्टमी के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाएँ मांगते हैं। पूरे गाँव में भक्ति और उत्साह का माहौल बना रहता है।
गाँव के लोगों का कहना है कि वे इस परंपरा को सदियों से पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाते आ रहे हैं और आगे भी इसे बनाए रखेंगे।
