सत्तू खाकर पढ़ाई, संघर्ष से सफलता तक: गया के डॉ. बैरम खान बने अमेरिका में प्रोफेसर

गयाजी के बांके बाजार प्रखंड के खजूरिया गांव के रहने वाले डॉ. बैरम खान की कहानी संघर्ष, मेहनत और सफलता की मिसाल है। कभी आर्थिक तंगी और विपरीत परिस्थितियों से जूझने वाले बैरम खान आज अमेरिका की प्रतिष्ठित में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और वहां भारतीय भाषाओं व संस्कृति का ज्ञान दे रहे हैं।

डॉ. बैरम खान का बचपन गरीबी और अभावों में बीता। नक्सल प्रभावित क्षेत्र में रहने के कारण उनके परिवार को अपनी पैतृक जमीन छोड़कर पलायन करना पड़ा। एक कमरे के छोटे से घर में पूरा परिवार रहता था। आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि पढ़ाई जारी रखना भी चुनौती बन गया था। इसके बावजूद माता-पिता ने शिक्षा को कभी रुकने नहीं दिया।

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बैरम खान ने छठी कक्षा से ही ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था। दिन में स्कूल और रात में ट्यूशन पढ़ाकर वे अपनी पढ़ाई और परिवार का खर्च चलाते थे। मैट्रिक के बाद आर्थिक संकट के कारण पढ़ाई छोड़ने का विचार आया, लेकिन माता-पिता ने उनका हौसला बढ़ाया। इंटर की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे महज 1500-2000 रुपये लेकर दिल्ली पहुंचे और में दाखिला लिया।

बाद में भाषा विज्ञान में रुचि बढ़ने पर उन्होंने पढ़ाई के बीच में ही दिशा बदली और से लिंग्विस्टिक्स की पढ़ाई की। आर्थिक संघर्ष जारी रहा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। नेट क्वालीफाई किया, पीएचडी पूरी की और 2015 में अमेरिका के विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए।

डॉ. बैरम खान को अमेरिका में दो बार बेस्ट टीचर अवॉर्ड भी मिल चुका है। वे युवाओं को संदेश देते हैं कि गरीबी सफलता की बाधा नहीं है। तानों का जवाब बहस से नहीं, बल्कि अपनी उपलब्धियों से देना चाहिए। उनका मानना है कि अनुशासन, जिम्मेदारी और शिक्षा के बल पर कोई भी छात्र दुनिया के बड़े मंच तक पहुंच सकता है।

आज उनकी सफलता पर पूरा परिवार गर्व करता है। कभी ताने देने वाले लोग अब अपने बच्चों को उनसे मार्गदर्शन दिलाने की कोशिश करते हैं। डॉ. बैरम खान की कहानी बताती है कि कठिन परिस्थितियां चाहे जितनी भी हों, दृढ़ संकल्प और मेहनत से हर सपना पूरा किया जा सकता है।

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