पटना उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को आपसी सहमति से तलाक (म्यूचुअल डिवोर्स) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट और सख्त व्याख्या करते हुए कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(बी) के तहत तलाक की डिक्री तभी दी जा सकती है, जब पति-पत्नी कम-से-कम एक वर्ष तक अलग रह चुके हों। इस अनिवार्य शर्त के अभाव में अदालत तलाक की अनुमति नहीं दे सकती।
यह फैसला जस्टिस नानी तागिया और जस्टिस आलोक कुमार पांडेय की खंडपीठ ने कुमारी दिप्ती (बदला हुआ नाम) बनाम कुमार संदीप (बदला हुआ नाम) मामले में सुनाया। अदालत ने शिवहर के परिवार न्यायालय द्वारा पहले दिए गए आदेश को सही ठहराते हुए अपील को खारिज कर दिया।
दरअसल, इस मामले में पति-पत्नी ने आपसी सहमति से तलाक के लिए संयुक्त याचिका दायर की थी। लेकिन परिवार न्यायालय ने इसे यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि दोनों पक्ष एक वर्ष की अनिवार्य अवधि तक अलग नहीं रहे थे। इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील की गई थी।
मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि दोनों की शादी 15 मार्च 2023 को हुई थी और मात्र दो महीने के भीतर, 11 मई 2023 को तलाक की याचिका दाखिल कर दी गई। स्वयं पति ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया।
खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ‘अलग रहना’ का अर्थ केवल भौतिक दूरी बनाना नहीं है, बल्कि इसका मतलब है कि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक संबंध पूरी तरह समाप्त हो चुके हों। जब तक यह स्थिति कम-से-कम एक वर्ष तक न बनी रहे, तब तक धारा 13(बी) के तहत तलाक की प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकती।
अदालत के इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि आपसी सहमति से तलाक के मामलों में कानूनी शर्तों का सख्ती से पालन अनिवार्य है और जल्दबाजी में दायर याचिकाओं को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
