गया जिले के महकार गांव के किसान राजेश्वर सिंह की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि स्वाभिमान और प्रतिरोध की मिसाल है। वर्ष 1930 में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान एक घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। अंग्रेज अधिकारी, जिन्हें ‘लाट साहब’ कहा जाता था, अक्सर किसानों की फसलों को रौंदते हुए घोड़ों पर गांवों में घूमते थे। एक दिन उन्होंने राजेश्वर सिंह के खेत में घोड़े बांध दिए और विरोध करने पर मजदूरों के साथ मारपीट की।
इस अपमान ने राजेश्वर सिंह को झकझोर दिया। उन्होंने संकल्प लिया कि घोड़े पर सवारी सिर्फ अंग्रेजों का अधिकार नहीं होगा, बल्कि एक साधारण किसान भी घोड़े पर चलेगा। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अनाज और नगद देकर राजस्थान से पहला घोड़ा खरीदा। यह कदम अंग्रेजों को नागवार गुजरा और उन्हें परेशान किया गया, लेकिन वे झुके नहीं।
राजेश्वर सिंह ने न केवल खुद घुड़सवारी की, बल्कि अपने मजदूरों को भी घोड़े देकर बाजार भेजते थे। धीरे-धीरे यह विरोध एक परंपरा बन गया। आज उनके परिवार की तीसरी पीढ़ी भी घोड़े पालती है और घुड़सवारी में निपुण है।
वे सिर्फ स्वाभिमानी किसान ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उन्होंने पटना-इस्लामपुर रेल लाइन को हिलसा के पास उखाड़कर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था। कई प्रयासों के बावजूद अंग्रेज उन्हें पकड़ नहीं सके।
आज उनके वंशज इस विरासत को गर्व से निभा रहे हैं। परिवार में ‘बादशाह’ नाम का सिंधी नस्ल का घोड़ा है, जिसकी देखभाल विशेष रूप से की जाती है। बच्चों को कम उम्र से ही घुड़सवारी सिखाई जाती है और घोड़े को परिवार का सदस्य माना जाता है।
राजेश्वर सिंह की यह कहानी बताती है कि आत्मसम्मान से जन्मा छोटा सा विरोध भी समय के साथ परंपरा और पहचान बन सकता है।
